सीएम ने घोषणा कर दी, पर समाचार पत्र वितरक नहीं बने कानूनन कर्मकार
- अमर उजाला की पड़ताल में सच सामने आया
- कानूनन समाचार पत्र वितरक कर्मकार की श्रेणी में आए ही नहीं
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कर्मकार की श्रेणी में लाने की जिस घोषणा पर प्रदेश भर के समाचार पत्र वितरकों ने मुख्यमंत्री का सम्मान किया था, उस श्रेणी में अब तक उन्हें शामिल नहीं किया गया। समाचार पत्र वितरकों को कर्मकार के तहत लाने पर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की कौन सी सुविधा, कैसे मिलेगी, शुक्रवार को यह पड़ताल करने के दौरान यह कड़ुवा सच सामने आया।
दरअसल, मुख्यमंत्री के नुमाइंदे दावा कर रहे हैं कि कानून में संशोधन कर दिया गया, मगर श्रम विभाग का कहना है कि जिस उत्तराखंड औद्योगिक (विवाद) संशोधन-2015 का हवाला दिया जा रहा है, उसमें दी गई कर्मकार की परिभाषा के तहत समाचार पत्र वितरक नहीं आते।
मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार सुरेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि मुख्यमंत्री हरीश रावत समाचार पत्र वितरकों को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं, अगर कोई कंफ्यूजन है तो हम इसके लिए विधिक राय लेकर उसी के मुताबिक कानूनी संशोधन कर लेंगे। खैर, जो भी है, प्रदेश भर के समाचार पत्र वितरकों ने कर्मकार बनाए जाने की घोषणा पर जो खुशियां मनाई थीं, फिलहाल उस पर पानी फिरता प्रतीत हो रहा है।
गौरतलब है कि अमर उजाला ने समाचार पत्र वितरकों को कर्मकार की श्रेणी में लाने के लिए मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन दिया था। मुख्यमंत्री ने वितरकों को कर्मकार की श्रेणी में लाने का वादा किया और इसकी पूरी प्रक्रिया पर नजर रखने की जिम्मेदारी मीडिया सलाहकार सुरेंद्र अग्रवाल को दी।
इस संबंध में बृहस्पतिवार को अग्रवाल से वस्तुस्थिति पूछी गई तो उन्होंने समाचार पत्र वितरकों को कर्मकार की श्रेणी में शामिल करने के साक्ष्य के तौर पर उत्तराखंड औद्योगिक विवाद (संशोधन) 2015 विधेयक के नोटिफिकेशन की प्रति सौंपी। उसमें धारा 2य में लिखा है- कर्मकार से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है......विक्रय संवर्धन हेतु किसी कार्य के लिए नियोजित हो..।
इस नोटिफिकेशन को लेकर अमर उजाला संवाददाता ने श्रम विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया तो बताया गया कि इस संशोधन के हवाले से समाचार पत्र वितरकों को शामिल किए जाने की बात बिल्कुल बेमानी है। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। हालांकि अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर सीएम चाहेंगे तो समाचार पत्र वितरकों को सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं में कवर दिलवाने के बहुतेरे रास्ते हैं।
जिस घोषणा के लिए सीएम का सम्मान, उसी का नहीं लाभ
गौरतलब है कि इसी उपलब्धि के लिए ही तो मुख्यमंत्री ने समाचार पत्र वितरकों से बाकायदा सम्मान-धन्यवाद प्राप्त किया था। दिसंबर-1015 में प्रदेश भर के सभी वरिष्ठ समाचार पत्र वितरकों ने कांग्रेस नेता आशा मनोरमा शर्मा डोबरियाल की अगुवाई में उत्तराखंड कामगार महासंघ के बैनर तले मुख्यमंत्री का सम्मान समारोह रखा।
उसमें मंच से मुख्यमंत्री ने बार-बार घोषणा की थी कि समाचार पत्र वितरकों को कर्मकार की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है। उसी मंच से सीएम ने वितरकों को साइकिल, रेनकोट और छाता देने की घोषणा की थी। जिसे हाल ही कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर पारित करने की भी घोषणा कर दी गई है।
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने मंच से कई बार यह भी कहा कि अमर उजाला की पहल पर उन्होंने यह काम किया है। लिहाजा यह सच अमर उजाला के लिए आघात पहुंचाने वाला है। अमर उजाला अपने स्तर पर इसके लिए प्रयासरत रहेगा। गौरतलब है कि समाचार पत्र वितरकों को कर्मकार की श्रेणी में लिए जाने पर कुछ प्रकाशन समूहों ने भी दावा किया था कि उनके प्रयास से यह संभव हुआ। अमर उजाला की उनसे अपील है कि अब फिर प्रयास करना है लिहाजा जरूर कोशिश करें।
केंद्र सरकार कर सकती है एक्ट में संशोधन: अपर सचिव
समाचार पत्र वितरक कर्मकार की श्रेणी में नहीं आते। एक्ट में संशोधन केंद्र सरकार के स्तर पर संभव है। मुख्यमंत्री ने समाचार पत्र वितरकों के हित में जो घोषणाएं की हैं, उन्हें पूरा करने के लिए राज्य सरकार के स्तर से योजना तैयार की जाएंगी।
-डॉ. पंकज पांडेय, अपर सचिव (श्रम विभाग)
कर्मकार की श्रेणी में शामिल होने पर क्या होता?
समाचार पत्र वितरकों को अगर कर्मकार की श्रेणी में शामिल कर लिया गया होता तो कर्मकारों के लिए प्रचलित राज्य और केंद्र सरकार की समाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ उन्हें भी मिलने लगता। साथ ही उत्तराखंड देश का पहला राज्य होता, जहां समाचार पत्र वितरकों के पेशे का नाम सरकारी रिकॉर्ड में आ जाता। इसका दूरगामी फायदा यह होता कि देश के अन्य राज्य भी इस पर अमल करते। साथ ही भविष्य में जो भी कल्याणकारी योजनाएं बनती उसमें इस पेशे की जरूरतों को भी ध्यान रखा जाता।