फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   netaji subhash chandra bose death dehradun connection.

सुभाष चंद्र बोस की मौत के राज से देहरादून का गहरा नाता

Mon, 21 Sep 2015 10:31 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 21 Sep 2015 10:31 AM IST
विज्ञापन
netaji subhash chandra bose death dehradun connection.

देहरादून से नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत के विवाद का पुराना और गहरा नाता है। नेताजी की मौत की जांच के लिए गठित जस्टिस मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में देहरादून के स्वामी शारदानंद का जिक्र किया था।

विज्ञापन


जस्टिस एम के मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में देहरादून के आयाम को जोड़ते हुए साफ तौर पर महान संत और तपस्वी स्वामी शारदानंद और नेताजी सुभाष में गहरा नाता बताया था। हालांकि उनके शिष्य साफ तौर पर कहते हैं कि स्वामी जी सुभाष नहीं थे।
विज्ञापन


यह जरूर है कि स्वामी शारदानंद भी इस मत केसमर्थक थे कि नेताजी जी की मौत विमान हादसे में नहीं हुई है। ध्यान योग्य है कि तपस्वी एवं संत स्वामी शारदानंद लंबे समय तक उत्तराखंड के विभिन्न इलाकों व देहरादून में रहे। यहां पर ही उन्होंने शरीर त्यागा और उनका अंतिम संस्कार भी मायाकुंड ऋषिकेश में किया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


तब पुलिस ने उनको सम्मान के साथ विदाई दी थी। उनके पार्थिव शरीर को पुलिस की कड़ी सुरक्षा में देहरादून से ऋषिकेश ले जाया गया था। 14 अप्रैल 1977 को स्वामी शारदानंद ने जब शरीर छोड़ा, उस समय उनके शिष्यों के दो ग्रुपों में आपसी विवाद हो गया था। जो लोग उन्हें नेताजी सुभाष मानते थे वे उनके पार्थिव शरीर का संस्कार करना चाहते थे। लेकिन पार्थिव शरीर उन लोगों के पास था जो उन्हें सिर्फ और सिर्फ स्वामी शारदानंद मानकर चलते थे।

नेताजी की आजाद हिंद फौज में रहे कर्नल प्रीतम सिंह ने उनके भक्तों का पक्ष लिया तब जाकर यह मामला शांत हुआ था। आपको बता दें कि दून का राजपुर क्षेत्र हमेशा से संतों व तपस्वियों का तपोस्थल रहा है। यहां पर महान तपस्वी व अंर्तमुखी संत स्वामी शारदानंद ने भी अंतिम कुछ वर्ष बिताए थे।

सरकार उन पर शक करती रही कि वे ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं। आजाद हिंद फौज से जुड़े लोग भी इसी मत के समर्थक रहे। अब जबकि नेताजी के 1945 के बाद भी जीवित होने की बात सामने आई है तो एकाएक स्वामी शारदानंद जी का जिक्र होना लाजिमी है।

नेहरू-इंदिरा से भी मिलने से कर दिया था इनकार

netaji subhash chandra bose death dehradun connection.

देहरादून स्थित राजपुर मार्ग (सांई मंदिर के आगे) डॉ. वीरेंद्र शर्मा व निहार दत्ता शर्मा उसी जगह रहते हैं जहां कभी स्वामी शारदानंद निवास करते थे। इन दोनों के माता-पिता भी स्वामी जी के शिष्य थे। ये लोग भी गृहस्थ जीवन जी रहे हैं, लेकिन अपनी जिंदगी अपने गुरु के आदेशानुसार ही बिताते हैं।

निहार दत्ता के पिता दीनबंधु दत्ता ने अपना जीवन व फलकटा (शौलमारी आश्रम) की सारी संपत्ति स्वामी जी को अर्पित कर दी थी। डॉ. वीरेंद्र के पिता स्व. अमरनाथ शर्मा का भी सारा जीवन बाबा को ही समर्पित रहा। ये दोनों बताते हैं कि 1958 से 1966 तक स्वामी जी कूचबिहार जिले में शौलमारी फलकटा में रहे। लेकिन वहां पर सरकार व नेताजी सुभाष के भक्तों द्वारा दबाव बनाने पर उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया।

आज भी वहां पर आश्रम है। उसकेबाद वह चुपचाप ऊखीमठ पहुंचे और विकट साधना की। इसकेबाद देहरादून, देवधर व अमर कंटक में निवास किया। 1973 की ठंड में वह देहरादून के डालनवाला, गुरु तेगबहादुर रोड और फिर जाखन में रहे। अंतत: राजपुर पटियाला हाऊस में आ बसे। तब यहां पर सिर्फ और सिर्फ जंगल था।

इस दंपति का कहना है कि इन चार वर्षों में वे बहुत सीमित लोगों से मिलते थे। फोटो देखने और समुचित जांच केबाद ही किसी को दर्शन देते थे। नब्बे प्रतिशत दर्शनार्थियों को वे मना ही कर देते थे। इंटेलिजेंस हमेशा स्वामी जी पर नजर रखती थी।

जवाहरलाल नेहरू ने कई मर्तबा उनसे मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भी चाहत थी कि वे उनके दर्शन करें, लेकिन स्वामी जी ने आग्रह को विनम्रता से ठुकरा दिया। खास बात यह थी कि वह दान भी बहुत सीमित लोगों से ही लेते थे।

आजाद हिंद फौज के लोग स्वामी को मानते थे नेताजी

netaji subhash chandra bose death dehradun connection.

निहार दत्ता शर्मा व डॉ. वीरेंद्र शर्मा भावुक होकर बताते हैं कि कूचबिहार स्थित शौलमारी आश्रम में वे आजाद हिंद फौज के लोगों से कतई नहीं मिलते थे। जबकि देहरादून में वह खुलकर इनसे मुलाकात कर लेते थे। मजे की बात यह है हमेशा से आजाद हिंद फौज के लोग स्वामी शारदानंद को नेताजी ही मानते थे।

स्वामी शारदानंद ने हमेशा यह कहा कि नेता जी की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई। उनकी मौत हुई या नहीं यह पता लगाने का काम सरकार का है। बाबाजी आग्रहपूर्वक कहते थे कि वह सुभाष नहीं हैं।

बचपन से ही उनका शिष्यत्व ग्रहण करने वाले नित्यानंद चक्रवर्ती उनका नाम लेने पर भावुक हो जाते हैं। इसी तरह जयंत दत्ता व सुब्रत दत्ता कहते हैं कि गृहस्थी तो सिर्फ माध्यम है। असली लक्ष्य तो बाबाजी के बताए रास्ते पर चलने का है।

हावर्ड-आक्सफॉर्ड
स्वामी शारदानंद ने कई किताबें लिखीं। उन्होंने मनोविज्ञान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शोध किया था। जबकि डीएससी हावर्ड विश्वविद्यालय से की थी। वे वैज्ञानिक सोच के पक्षधर थे।

सिर से निकले थे प्राण
स्वामी शारदानंद के शिष्य बताते हैं कि दो जनवरी 1977 को वे समाधि में चले गए थे और 14 अप्रैल को शरीर छोड़ दिया था। उनके प्राण सिर से निकले थे।

चंद लोग ही रहे स्वामी जी के निकट
स्वामी शारदानंद के शिष्यों में कर्नल प्रीतम सिंह, मातावाला बाग के हरस्वरूप कुकरेती, घोसी गली केपुरुषोत्तम आर्य, पलटन बाजार के व्यापारी सोहन लाल कपूर व ऋषिकेश के बुद्धिबल्लभ पैन्यूली, बटन वाले गोविंद कुमार प्रमुख थे। डॉ. रमणीरंजन दास उनके सचिव थे। ये ही लोग स्वामी जी के सबसे निकटस्थ रहे। इन्होंने हमेशा इन्हें स्वामी जी को संत ही माना, सुभाष नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed