18 साल बाद एनडी फिर करेंगे कांग्रेस की नाक में दम
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कांग्रेसियों के बीच एक कहावत कही जाती है कि कांग्रेस विरोधियों से नहीं हारती अपनों से हार जाती है।
कांग्रेस को एक बार फिर 1996 की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। जब तिवारी कांग्रेस से नारायण दत्त तिवारी और सतपाल महाराज ने दो सीटें झटकी थीं। 18 साल बाद फिर कुछ वैसे ही समीकरण बने हैं।
एक ओर नैनीताल सीट से नारायण दत्त तिवारी चुनाव लड़ने का हठ पाले हैं जिससे पार्टी के वोट का योग बिगड़ता दिख रहा है।
वहीं पौड़ी सीट पर कई अपनों को अपनाने के बावजूद सतपाल महाराज के अलग होने का नुकसान को लेकर भी कांग्रेस सशंकित है।
तिवारी ठोक रहे नैनीताल से ताल
नैनीताल से तिवारी चुनावी ताल ठोंक रहे हैं लेकिन पार्टी उन्हें लेकर फिलहाल खामोश है। प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला का कहना है कि जब तक पूरी तरह से इस बात की पुष्टि नहीं हो जाती है कि तिवारी चुनाव लड़ने जा रहे हैं तब तक कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है।
तिवारी चुनाव जीतेंगे कि नहीं यह तो नतीजे बताएंगे लेकिन उनके लड़ने का सीधा असर कांग्रेस उम्मीदवार केसी सिंह बाबा के नतीजों पर पड़ेगा।
वहीं समाजवादी पार्टी लंबे समय से तिवारी पर डोरे डाल रही है। अगर सपा तिवारी का समर्थन करती है तो नैनीताल सीट पर मुकाबला त्रिकोणयीय हो जाएगा।
पौड़ी में सतपाल महाराज बने फांस
उधर पौड़ी सीट को मजबूती देने के लिए कांग्रेस की बटालियन में टीपीएस रावत और गंभीर सिंह नेगी ने मजबूती से मोर्चा संभाल लिया है। इसका फायदा पार्टी को सैनिक-पूर्व सैनिकों के बीच जरूर मिलेगा।
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सतपाल महाराज कांग्रेस छोड़ देते तो शायद उतना नुकसान नहीं होता लेकिन उनके भाजपा में जाने से पार्टी को अधिक नुकसान होगा।
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महाराज ने विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसे विधायक अपने दम पर जिताए जिन्हें कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया था।
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पत्नी अमृता रावत समेत जो विधायक महाराज के करीबी कहे जाते हैं उनमें अधिकतर पौड़ी संसदीय क्षेत्र से ही हैं। ऐसे में पार्टी को ज्यादा खतरा अपनों से ही रहेगा।