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विदेश में जगमगाया हिंदी साहित्य का नाम
अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 27 Sep 2014 02:41 PM IST
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डेनमार्क में रह रहीं मशहूर साहित्यकार अर्चना पैन्यूली ने हिंदुस्तान समेत दूसरे देशों में भी कीर्ति पताका फहराई है। हंस, कथादेश, वागार्थ जैसी बेहद प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों के साथ तार जोड़ने वालीं अर्चना पैन्यूली के दो उपन्यास परिवर्तन और व्हेयर डू आई बिलांग चर्चा में रहे हैं।
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भारतीय ज्ञानपीठ की तरफ से प्रकाशित व्हेयर डू आई बिलांग का इसी साल अंग्रेजी रूपांतरण भी आया है। देहरादून की रहने वाली अर्चना पति के रिसर्च फील्ड में डेनमार्क में जाब हासिल करने के बाद उनके साथ 1997 में वहां चली गईं।
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अभी वह वहां एनजीजी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ा रही हैं। उनकी एक कहानी चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के कोर्स में भी पढ़ाई जा रही है। 17 मई, 1963 में जन्मीं अर्चना की प्रारंभिक शिक्षा यहां एमकेपी कालेज से हुई। गढ़वाल विश्वविद्यालय से 84 में उन्होंने बीएससी, जबकि 86 में एमएससी किया। 87 में पति के साथ वह मुंबई चली गईं।
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विदेश में कई पुरस्कार मिले
लगभग 51 वर्षीया अर्चना को 2006 में प्रेमचंद पुरस्कार दिया गया। 2011 में उन्हें इंडियन कल्चरल एसोसिएशन डेनमार्ककी ओर से ‘प्राइड आफ द ईयर’ के खिताब से नवाजा गया।
कारेन ब्लिक्शन का हिंदी अनुवाद
साहित्यकार अर्चना पैन्यूली ने मशहूर डेनिश लेखक कारेन ब्लिक्शन की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी किया है। कारेन लीक से हटकर कहानियों के लिए जानी जाती हैं।