हरिद्वारः भूखे पेट गुजरी भावी नेशनल खिलाड़ियों की रात, ये सुविधाएं भी नहीं मिली
- प्रांतीय विद्यालयी एथलेटिक्स एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता में हरिद्वार पहुंची 13 जनपदों की 14 टीम
- 1500 रही पूरी टीमों में छात्र और छात्रा खिलाड़ियों की संख्या
- 6 साल से 19 साल के खिलाड़ी पहुंचे प्रतियोगिता के लिए
- खिलाड़ियों के कमरे में नहीं थी लाइट की कोई व्यवस्था
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प्रदेश की खेल प्रतिभाओं को तराशकर नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर खिलवाने के दावे उस वक्त तब खोखले होते दिखाई दिए जब प्रदेश के खिलाड़ियों को खाली पेट सोना पड़ गया। सुबह जहां खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन के लिए अच्छी डाइट देनी चाहिए थी, वहां रातभर भूख से बिलबिलाए खिलाड़ियों को ब्रेड और चाय परोसी गई।
कमरों में लाइट और बिस्तर तक की व्यवस्था नहीं की गई थी। ये आलम तब था जब इन खिलाड़ियों में कक्षा छह से 12 तक के ही छात्र-छात्राएं शामिल थे। इन अव्यवस्थाओं के बीच छात्राओं को परेशानियों से सबसे ज्यादा रूबरू होना पड़ा। ये आलम हरिद्वार में शुरू हुई तीन दिवसीय प्रांतीय विद्यालयी एथलेटिक्स एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता के पहले दिन देखने को मिला।
हरिद्वार में बुधवार से शुरू हुई प्रांतीय विद्यालयी एथलेटिक्स एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उत्तरकाशी, उधमसिंहनगर, चमोली समेत प्रदेश के सभी जनपदों से खिलाड़ी एक दिन पहले ही हरिद्वार पहुंच गए थे। हरिद्वार पहुंचने में खिलाड़ियों को रात हो गई। कई जनपदों से बच्चे रात के दो बजे तक पहुंचे। इन खिलाड़ियों में सब जूनियर वर्ग में कक्षा छह से आठ में 14 वर्ष तक, जूनियर वर्ग में कक्षा 9 से 10 में 17 वर्ष तक और सीनियर वर्ग में कक्षा 11 से 12 में 19 वर्ष तक के खिलाड़ी शामिल थे।
कुल मिलाकर करीब 1500 खिलाड़ियों की संख्या थी। इनमें करीब आधी छात्राएं भी शामिल थी। आयोजकों की ओर से इन खिलाड़ियों के ठहरने के लिए जनपद के सरकारी स्कूलों में ही व्यवस्था की गई है। जब खिलाड़ी रात को स्कूलों के कक्षाओं में पहुंचे तो वहां मात्र गद्दे ही मिले। हालांकि रात के लिए गर्म कपड़े बच्चों को स्वयं लाने के निर्देश दिए हुए थे, लेकिन जिन कक्षाओं में उन्हें ठहरने के लिए व्यवस्था की गई उनमें साफ सफाई और लाइट तक की व्यवस्था नहीं की गई थी। रात में बच्चों एवं स्टाफ के लिए खाने तक की कोई व्यवस्था नहीं थी।
पूरे दिन सफर में गुजारने के बाद रात को भी बड़े खिलाड़ियों के साथ ही मासूम खिलाड़ियों को खाली पेट सोना पड़ा। गर्म कपड़ों की व्यवस्था न होने के चलते एक लिहाफ में तीन से चार खिलाड़ियों को सोना पड़ा। अब उन्हें उम्मीद थी कि रात में भोजन नहीं मिला, लेकिन सुबह तो मिल ही जाएगा, लेकिन सुबह भी खिलाड़ियों को मात्र चाय और दो ब्रेड दिए गए। हालांकि पूर्व के अनुभवों से सीख लेते हुए कुछ जनपदों की टीमों के संयोजक अपनी व्यवस्था साथ लेकर आए। इस कारण उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। हालांकि लाइट और बिस्तर की उचित व्यवस्था न होने के चलते महिला खिलाड़ियों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई।
दोपहर बाद मिला भोजन
आयोजन स्थल भल्ला स्टेडियम ठहरने वाले स्कूलों से पांच-पांच किमी की दूरी पर होने से कई जनपदों के बच्चों को पैदल ही आना पड़ा। शुभारंभ सत्र दोपहर डेढ़ बजे समाप्त हुआ तो बच्चों को ठहरने वाले स्थान पर भी भोजन के लिए कहा गया। इससे बच्चे बड़े निराश नजर आए। बच्चों को ठहरने के स्थानों पर पहुंचकर दोपहर बाद करीब तीन बजे भोजन मिल सका।
महिला खिलाड़ी और सिक्योरिटी जीरो
खिलाड़ियों में आधी संख्या महिला खिलाड़ियों की रही। बावजूद इसके उनके ठहरने से लेकर आयोजन स्थल पर सिक्योरिटी का कोई इंतजाम नहीं किया गया। जिन स्कूलों में लड़के एवं लड़कियां ठहरी हुई वहां पर केवल स्कूल का सिक्योरिटी गार्ड ही था।
यही हाल भल्ला स्टेडियम में भी देखने को मिला। यहां सिक्योरिटी न होने के चलते आवारा लड़के मैदान के अंदर घूमते हुए मिले। ऐसे में यदि किसी छात्र या छात्रा के साथ कोई अनहोनी होती है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, यह बड़ा सवाल खड़ा होता है।
विभाग से मात्र 2.50 लाख रुपये का बजट मिलता है। इससे आयोजन में आने वाले बच्चों के लिए समुचित इंतजाम करने में परेशानी रहती है। ऐसे में कुछ इंतजाम स्कूलों की ओर से ही करने को कहा गया। जिन स्कूलों में लाइट की व्यवस्था नहीं थी उनमें बुधवार को कराई गई है। बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था की जिम्मेदारी संबंधित जनपदों के क्रीड़ा संयोजक के द्वारा स्टाफ से तालमेल करने को निर्देश दिए गए थे। मामले की जांच कराई जाएंगी।
- डॉ. आनंद भारद्वाज, जिला शिक्षा अधिकारी