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सरकारी ‘व्यवस्था’ ने पहुंचाई कारोबार को चोट

Mon, 15 Sep 2014 03:56 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 15 Sep 2014 03:56 PM IST
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nanda raj jat yatra

राजजात की अपनी विशेषता को जाने बिना व्यवस्था को बनाने की सरकार की कोशिश भारी भी पड़ सकती है। सरकारी तामझाम केचलते इस बार की जात से ही कई गांव दूर ही रहे। ऐसे में जात से जुड़ा कारोबार भी प्रभावित हो सकता है।

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इस बार नजारा थोड़ा बदल गया
करीब 22 दिन की नंदा राजजात में कई गांव शामिल होते हैं। परंपरा यह भी है कि जिस गांव में यात्रा पहुंचती है, उस गांव के लोग यात्रियों के रहने और खाने का इंतजाम भी करते हैं। गांव की सीमा तक बाकायदा नंदा को विदा किया जाता है। पिछली कुछ जातों में यही व्यवस्था रही थी पर इस बार नजारा थोड़ा बदल भी गया।
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राज्य गठन के बाद पहली बार आयोजित हो रही नंदा राजजात में इस बार व्यवस्था को लेकर सरकार का आग्रह बहुत अधिक रहा। नौटी से शुरू हुई जात के सुगम पड़ावों पर तो इस बात से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। कारण हर पड़ाव पर प्रशासनिक अमले को पहले अपने लिए ही व्यवस्था करनी पड़ रही थी।
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इसके साथ यात्री भी अपनी व्यवस्था खुद ही कर ले रहे थे। मसलन नौटी में ही कई लोगों ने या तो मंदिर में रात गुजारी या फिर कर्णप्रयाग लौटना बेहतर समझा। मुसीबत कासवा में हुई। कासवा में लोगों के लिए वापस लौटने की गुंजाइश थी।

गांव में दो सरकारी स्कूल थे जिसमें से एक में पुलिस और प्रशासन का डेरा था। दूसरे स्कूल में जगह इतनी नहीं थी कि सभी सात्री समा पाते। ऐसे में कुछ जगह टैंट भी लगाए गए पर यह नाकाफी साबित हुए।

लिहाजा रहने की व्यवस्था को लेकर यात्रियों ने गांव वालों की जगह प्रशासन की ओर रुख किया। रहने की व्यवस्था को लेकर नौटी के बाद पहली बार अगर कोई विवाद हुआ तो इसी गांव में। कारण यह भी रहा कि हर जगह यही बताया गया कि रहने और खाने की व्यवस्था सरकार के स्तर पर हो रही है।

अधिकारी और कर्मचारी भंडारों में खाना खाने को मजबूर

लिहाजा पूरा गांव रहने और खाने की व्यवस्था से दूर ही रहा। एक मात्र फल्दिया गांव था जहां गांव की महिलाओं ने यात्रियों के लिए खाने की व्यवस्था की। सरकार की व्यवस्था वैसे भी हर पड़ाव पर भंडारा लगाने वालों पर ही निर्भर रही। कई जगह खुद अधिकारी और कर्मचारी इन भंडारों में पेट पूजा करने को विवश रहे।

सबसे ज्यादा खराब हालात निर्जन पड़ावों के थे। निर्जन पड़ाव की ओर बढ़ते वक्त लोग अपने लिए चने चबेने का इंतजाम कर लेते हैं। कुछ स्थानों पर वाण और सुतोल के लोग अपने होटल भी लगाते हैं। पर सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कर इस बार होटल, चाय की दुकान न के बराबर रहीं।

गैरोली पातल में वन विभाग की चौकी में एक दुकान में मैगी और खाने-पीने का सामान मिला तो खासा हो हल्ला हुआ। लोगों की शिकायत थी कि सामान दोगुने से चौगुने रेट पर मिल रहा है। तोहमत यह कि सरकार की ओर से व्यवस्था होती तो दुकानदार ऐसा न कर पाता।

दुकानदार भी वाण का था और उसका कहना था कि सामान लाने में चौगुना किराया देना पड़ रहा है। इसी तरह भगुआ वासा में एक होटल था। वेदनी में भी कुछ छोटा मोटा सामान लोगों ने रखा। पर बाकी के पड़ाव पर कोई सामान लेकर नहीं पहुंचा। यह तब है जबकि गढ़वाल में हर जात के साथ मेले-ठेले की परंपरा भी जुड़ी हुई है।


केदारनाथ में भी यही हाल
केदारनाथ में यात्रियों के लिए निशुल्क भोजन और रहने की व्यवस्था का आलम रहा कि यात्रा से स्थानीय व्यवसायी जुड़ ही नहीं पाए। हाल यह रहा कि केदारनाथ पैदल मार्ग पर स्थानीय व्यवसायियों की एक भी दुकान नहीं थी। दूसरी ओर जीएमवीन जरूर सामान बेच रहा था। यह व्यवस्था यात्रियों को जरूर रास आई हो पर स्थानीय व्यापारी इसमें जरूर नुकसान उठा गए।

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