इंसानों जैसी इन शिलाओं में छिपे हैं मां नंदा के रहस्य
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सोमवार प्रात: शुभ मुहूर्त पर बेदनी कुंड में महागौरी, महाकाली और भगवान शंकर की पूजा होगी। कुंड में राजकुंवर और नंदा भक्त अपने पित्रों को तर्पण करेंगे तो हरे-भरे बुग्यालों के बीच स्थित कुंड में महागौरी और शिव के विवाह संस्कार भी कराए जाएंगे।
नंदा की यात्रा का यह स्थान कई प्राचीन कहानियों को समेटे हुए है। कुंड के समीप आज भी देवासुर संग्राम के दौरान महाकाली और महिषासुर युद्ध के चिह्न हैं। लोगों का कहना है कि भैंस के पैर के खुर के निशानों को चाहे कितनी बार भी मिटाने की कोशिश करें, कुछ देर में ये दोबारा उभर जाते हैं।
इस स्थान पर खड़े होकर भूमि में कंपन भी महसूस होता है। वर्ष 2000 की राजजात में गए पीसी डिमरी और बीते लोकजात में शामिल हुए थराली के प्रेम बुटोला बताते हैं कि उन्होंने स्वयं भूमि में कंपन को महसूस किया था। पंडित अनसूया प्रसाद कोठियाल भी इस बात पर सहमति जताते हैं।
फ्लैश बैक - राजजात 2000
4 सितंबर 2000 को नंदा राजजात पहले निर्जन पड़ाव गैरोली पातल से दूसरे निर्जन पड़ाव पातरनचौंणियां पहुंची थी। प्रात: आठ बजे ही नंदा गैरोली से आगे के लिए बढ़ चली थी। 11 बजे के करीब राजजात बेदनी पहुंची। इस बुग्याली क्षेत्र के एक तरफ रूपकुंड सांस्कृतिक कलामंच के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा था।
रिमझिम बारिश हो रही थी, चारों तरफ कोहरा छाया हुआ था। दिन चढ़ने के साथ ही बारिश भी तेज हो रही थी। बावजूद नंदा भक्तों का उत्साह अपने चरम पर था। बेदनी कुंड में राजजात की पूजा शुरू हुई। यहां पर परंपराओं के तहत शिव और गौरी का विवाह संस्कार संपन्न हुआ।
राजकुंवरों सहित श्रद्धालुओं ने अपने पित्रों को तर्पण दिए। दोपहर करीब तीन बजे के बाद सभी धार्मिक परंपराओं को निर्वहन करते हुए यात्रा पातरनचौंणियां के लिए रवाना हुई। तीखी चढ़ाई और बुग्यालों के बीच से गुजरते हुए नंदा की यात्रा करीब सात बजे पड़ाव पर पहुंची। इस दौरान चारों तरफ घना कोहरा छाने लगा था।
यात्रा में शामिल वरिष्ठ पत्रकार शंकर सिंह भाटिया बताते हैं कि बेदनी में राजजात में पहली बार 35 हजार लोग शामिल हुए थे। पूरे बुग्याल में लोग बिखरे हुए थे। मौसम खराब होने के बावजूद लोग काफी संख्या में लोग पातरनचौंण्यिा पहुंचे थे। इस वर्ष रविवार को भी बेदनी में यही स्थिति बनी रही।
बेदनी को इस बार राजजात में पड़ाव बनाया गया है। यहां पर कम से कम 40 से 45 हजार लोग इकट्ठा हुए हैं। पूर्व की तुलना में इस बार सरकारी अमला भी भारी संख्या में पहुंचा हुआ है।
देवी के दोष से नर्तकियां बन गई थी शिला
नंदा की यात्रा अब हिमालय के मध्य क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। बेदनी से लाता की मां भगवती के अपने घर लौटने के बाद अब कुरूड़ की नंदा भक्तों के साथ बेदनी से आगे की दुर्गम चढ़ाई पार कर तीसरे पड़ाव पातरनचौंणियां पहुंचती हैं।
यहां नंदा अन्य देवी डोलियों और छंतोलियों सहित भक्तों के साथ खुले आसमान के नीचे विश्राम करती हैं। यहां ऊंची-ऊंची पत्थर की शिलाएं हैं, जो यात्रा के कई रहस्यों को भी उजागर करती हैं। पातरनचौंणियां का नाम पहले निरालीधार था।
मान्यता है कि नवीं सदी में कन्नोज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती पत्नी बल्लभा सहित पूरी सेना और राजशाही सुख-सुविधाओं के साथ हिमालय यात्रा पर पहुंचा था। यहां राजा ने राज नतृकियों से नृत्य कराया। देवी अपने क्षेत्र में राजा के इस कृत्य से नाराज हो गईं।
देवी के दोष से ये नृतकियां आदम शिलाओं में तब्दील हो गईं, जो आज भी यहां विराजमान हैं। इसलिए निरालीधार स्थान का नाम पातरनचौंणियां पड़ा। यहां नंदा का ईष्ट और मंगल की देवी हैं। वह अपने भक्तों का अनिष्ट नहीं कर सकतीं।
नंदा एक तरफ जहां यात्रा में बेटी/बहन (ध्याण) के रूप में घर-घर पूजी जाती हैं वहीं भगोती के बाद वह बहू भी हैं। राजजात सोमवार को अपने 14वें पड़ाव पातरनचौंणियां पहुंचेगी। यह यात्रा का तीसरा निर्जन पड़ाव है। इस स्थान का वर्णन लोक जागर गायिका बसंती बिष्ट ने अपने जागरों में भी किया है।
तंबुओं में तब्दील हुआ बेदनी बुग्याल
संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में खूबसूरत नजारों के बीच अनगिनत फूलों के बजाय अनगिनत मानव सिर दिखाई दे रहे हैं। पूरा बेदनी बुग्याल यात्रा के नाम पर तंबुओं से ढका दिखाई दे रहा है। अनुमान से दस गुना ज्यादा लोगों के पहुंचने के कारण व्यवस्था भी ठप नजर आ रही है।
हाल यह है कि व्यवस्था से गुस्साए लोगों ने रविवार सुबह कंबल और टेंट लेकर आ रहे हेलीकॉप्टर को बेदनी में उतरने नहीं दिया। शनिवार देर शाम पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक यहां पहुंचे तो लोगों ने ढेर सारी शिकायतें उनके सामने भी रखी।
विधानसभा उपाध्यक्ष डॉ. अनसूया प्रसाद मैखुरी यात्रा में शामिल होने के बावजूद शिकायतें सुनने पर भी स्वयं को असहज महसूस कर रहे हैं। हाल यह है कि लचर व्यवस्थाओं के चलते लोग आगे के पड़ावों के लिए भागना बेहतर मान रहे हैं। बेदनी से ही खराब मौसम की चेतावनी के बाबजूद रविवार सुबह कई लोग अगले पड़ाव के लिए रवाना हो गए थे।
शनिवार को भी गैरोली पातल में रुकने के बजाय करीब सात हजार लोगों ने सीधे बेदनी की ओर रुख किया था। जबकि बेदनी में पहले से ही आठ से दस हजार लोग मौजूद थे। रविवार को कई लोग अगले पड़ाव के लिए रवाना हुए तो कुछ जगह खाली हुई। लेकिन कुछ ही देर में पीछे से आने वाले लोगों से यह जगह तुरंत भर गई।
बेदनी को देखकर इस समय यह नहीं लगता कि यह एक धार्मिक और पर्यटक स्पॉट है। बल्कि ऐसा लगता है, कि घास के मैदानों के बीच मानों किसी राजा ने अपनी सेना को बेतरतीब तरीके से खड़ा कर दिया हो।
एक तरफ नंदा स्तुति, दूसरी तरफ नारेबाजी
जहां भक्ति की रसधार बहनी चाहिए थी, वहां सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी के स्वर गूंज रहे थे। बेदनी में रविवार को हाल यह हो गया कि एक बार के लिए कुरूड़ की नंदा के लौटने तक की बातें होने लगीं। व्यवस्था से लाचार छंतोलियों और यात्रियों के आगे निकल जाने से कुरूड़ के लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है।
इन लोगों का कहना है कि सबसे आगे लाटू और उसके पीछे भगवती नंदा और फिर बाकी सबको होना चाहिए, लेकिन व्यवस्था का उपयोग करने के लिए लोग हैं कि आगे ही निकलते चले जा रहे हैं। नंदा की यात्रा में इस बार उम्मीद से अधिक लोग पहुंचे हैं। नौटी से लेकर नंदकेशरी और वाण से लेकर बेदनी तक के सफर में विवाद भी जुड़ते रहे।
कोटी में जहां नंदा ने स्वयं ही भक्तों से उसका कसूर बताने को कहा, वहीं मुंदोली में भी देवी नाराज हुईं। देवी का कहना था कि उससे पहले कैसे अन्य देव छंतोलियां पहुंच गई हैं।
यही स्थिति रविवार को बेदनी में भी रही। नंदा की यह यात्रा मान्यताओं, मर्यादाओं और परंपराओं की कड़ी के रूप में आगे बढ़ती है, लेकिन कई मौके पर लोग अपनी सुख-सुविधाओं को ज्यादा देख रहे हैं।