कैलास के लिए विदा हुई नंदा, छह खाडू गए साथ
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नंदा राजजात यात्रा में बुधवार को वह घड़ी आ गई, जब मां नंदा का 14 वर्ष का लंबा इंतजार आखिरकार खत्म हुआ। मां नंदा अब अपने पति परमेश्वर भगवान आशुतोष (शिव) की नगरी और अपनी ससुराल कैलास के लिए विदा हो गईं।
वैदिक अनुष्ठानों के बीच परंपरानुसार छोटा होमकुंड में पूजा-अर्चना के साथ चौसिंग्या खाडू को हिमालय के लिए विदा किया गया। करीब बारह हजार नंदा भक्त इस शुभ घड़ी के साक्षी बने।
त्रिशूली पर्वत की तलहटी पर स्थित इस पावन क्षेत्र में कुछ पलों के लिए भक्ति और उल्लास के माहौल ने हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं और हमेशा शांत रहने वाली वादियों को भी नंदा की स्तुति और जयकारों से गुंजायमान कर दिया।
एसडीआरएफ के डीआईजी संजय गुंज्याल और नौटी के ब्राह्मण सभी छह चौसिंग्या खाडुओं को कुछ दूरी तक भेजने भी गए। जबकि अन्य ब्राह्मण नंदा डोलियों के साथ लौट गए।
राजछंतोलियां छोटा होमकुंड में ही विसर्जित कर दी गई। दोपहर में करीब ढाई बजे यात्रा चंदनियाघाट पहुंच गई हैं, जबकि हजारों यात्री इससे पहले लाता कोपड़ी और जामुनडाली पहुंच गए।
वापसी के पहले पड़ाव चंदनियाघाट लौटी यात्रा
इससे पहले सुबह करीब 7.30 बजे यात्रा शिलासमुद्र से होमकुंड के लिए रवाना हुई। सिद्धपीठ कुरूड़ की मां भगवती की डोली की अगुवाई में राजछत्र, चौसिंग्या खाडू और यात्रा में शामिल अन्य देवी-देवताओं की छंतोलियां और निशान करीब 11-10 बजे छोटा होमकुंड पहुंचे।
यहां पर नौटी के राजगुरुओं ने शुभ मुहूर्त के अनुसार पूर्वाह्न 11.20 बजे पूजा शुरू की। राजगुरु दीपक नौटियाल, अतुल नौटियाल ने राजकुंवर परिवार के कुंवर तेजेंद्र सिंह के हाथों राजजात की मुख्य पूजा संपन्न कराई। विशेष पूजा-अर्चना के साथ यज्ञ अनुष्ठान किया गया।
रिंगाल की छंतोलियों को मां नंदा को अर्पित कर होमकुंड में विसर्जित करते हुए प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। दोपहर 12 बजे नंदा की यात्रा के पथ प्रदर्शक चौसिंग्या खाडू की पीठ पर फंची (पोटली) बांधी गई।
इस फंची में देवी के मायके की समलौंण के साथ नंदा की स्वर्ण प्रतिमा, अन्य आभूषण, अनाज, मौसमी फल-फूल और सब्जी व अन्य जरूरी वस्तुओं बांधकर उसे कुछ आगे तक जाकर हिमालय के लिए नम आंखों से विदा किया गया। इस मौके पर कई नंदा भक्त भावुक हो गए।
यहां पर पीछे मुड़कर न देखने की परंपरा का निर्वहन करते हुए सिद्धपीठ कुरुड़ की भगवती की डोली के साथ राजजात यात्रा अन्य देवी-देवताओं के निशान के साथ चंदनियाघाट के लिए वापस हो गई।
पढ़ें, होमकुंड में कितने बजे क्या हुआ
सुबह- 7.30 शिला समुद्र से यात्रा प्रस्थान
सुबह- 11.10 यात्रा छोटा होमकुंड पहुंची
सुबह- 11.20 छोटा होमकुंड में हवन-पूजा
सुबह- 11.53 नंदा और शिव का पूजा संपन्न
दोपहर- 12.00 चौसिंग्या खाडू की कैलास विदाई
दोपहर- 12.05 यात्रा चंदनियाघाट के लिए रवाना
छोटा होमकुंड में ही हुई राजजात
कर्णप्रयाग। राजजात समिति के महामंत्री भुवन नौटियाल ने बताया कि पहले मुख्य होमकुंड में राजजात होनी थी। रास्ता दुर्गम होने से छोटा होमकुंड में ही इस बार भी पूजा का निर्णय लिया गया।
वर्ष 1987 और वर्ष 2000 में छोटा होमकुंड में ही राजजात की गई थी। उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद पहली बार आयोजित नंदा की होमकुंड में हुई सफल यात्रा पर राजजात समिति सहित प्रशासन ने राहत की सांस ली है।