नैनीतालः कालाढूंगी के जंगल में इलग बम मिलने से सनसनी, सेना की टीम करेंगी डिफ्यूज
- पुलिस, सेना और वन विभाग की संयुक्त टीम ने बम को कब्जे में लेकर गड्ढे में दबाया
- बम को डिफ्यूज करने के लिए सेना की टीम आज जाएगी
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कालाढूंगी रेंज के निहाल रिजर्व वन ब्लॉक में बुधवार सुबह इलग बम (आसमान में तेज रोशनी करने वाला बम) मिलने से हड़कंप मच गया। कालाढूंगी पुलिस, सेना और वन विभाग की संयुक्त टीम ने बम को कब्जे में लेकर गड्ढे में दबाया। बम को डिफ्यूज करने के लिए सेना की टीम बृहस्पतिवार को कालाढूंगी पहुंचेगी।
कालाढूंगी थाने के एसआई बीआर पौरी ने बताया कि जंगल में गश्त के दौरान फॉरेस्ट गार्ड त्रिलोक और बीट वाचर अशोक को रॉकेटनुमा एक चीज दिखाई दी। इसकी सूचना उन्होंने रेंज कार्यालय को दी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कमोला आर्मी कैंप और कालाढूंगी पुलिस को सूचना दी गई।
सेना की टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच की तो रॉकेटनुमा यह चीज इलग बम निकला। पौरी ने बताया कि इलग बम सेना की संपत्ति है। इसका इस्तेमाल सर्च ऑपरेशन के दौरान रात के समय आसमान में तेज रोशनी करने के लिए किया जाता है। सेना रात के समय युद्ध के लिए इसका उपयोग करती है।
22 साल पुराना है इलग बम
निहाल रिजर्व वन ब्लॉक में मिला इलग बम करीब 22 साल पुराना है। एसआई पौरी ने बताया कि इलग बम में उसकी मैन्यूफैक्चरिंग डेट 1997 दर्ज है, जिससे इसके 22 साल पुराना होने की पुष्टि हुई है।
बम के जिंदा होने की संभावना
कालाढूंगी। सेना की टीम ने शुरूआती जांच में बम के करीब 20 प्रतिशत जिंदा होने की संभावना जताई है। जिसे देखते हुए बम को चार फीट गड्ढे में दफन किया गया है। आर्मी हेड क्वाटर को मामले की जानकारी दे दी गई है।
स्क्रैप के साथ पहुंचने का अंदेशा
अंदेशा जताया जा रहा है कि बम स्क्रैप के साथ यहां पहुंचा होगा। इसके बाद किसी ने इसे जंगल में फेंक दिया होगा।
ऊधमसिंह नगर में भी मिली थी 555 जिंदा मिसाइलें
उत्तराखंड में बम या मिसाइलें मिलने का यह पहला मामला नहीं है। कालाढूंगी रेंज के निहाल रिजर्व वन ब्लॉक से पहले ऊधमसिंह नगर जिले में भी 555 जिंदा मिसाइलों का जखीरा मिला था। 21 दिसंबर 2004 में यह मिसाइलें क्षेत्र की एक स्टील फैक्ट्री में स्क्रैप के साथ पहुंची थी।
मिसाइल में विस्फोट से फैक्ट्री के एक कर्मचारी की मौत भी हो गई थी। जांच में मिसाइलों के जिंदा होने की पुष्टि होने पर इन्हें एनजीसी की मदद से जसपुर क्षेत्र के पतरामपुरजंगल में दफनाया गया। इसके बाद लंबे समय तक इन्हें दफनाने की कवायद करने के बाद वर्ष 2018 में सेना की मदद से पतरामपुर में ही नदी किनारे दफन किया गया।