नैनीताल: आठ महीने में 85 लोग दे चुके जान, बढ़ रही किशोरों के आत्महत्या करने की घटनाएं
- आठ महीने में छह किशोरों ने जिले में की आत्महत्या
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किशोरावस्था जीवन की दिशा तय करने की महत्वपूर्ण कड़ी होती। यह वो दौर होता है जिसमें सही गलत की पहचान और उसे जिंदगी में उतारने का दमखम रखना होता है। धैर्य और समझदारी इस दौर की सबसे बड़ी ताकत होती है। इस ताकत को न सिर्फ किशोर बल्कि उनके अभिभावकों को समझना होता है। लेकिन जिले में किशोरों के आत्महत्या करने की घटनाएं बढ़ी हैं। आठ महीने में ही छह छह नाबालिगों ने फांसी लगाकर या जहर खाकर जान दी है।
नैनीताल जिला पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, जनवरी से लेकर अगस्त तक कुल 85 लोगों ने अलग-अलग तरीकों से जान दी है। इनमें चार नाबालिग किशोर और दो किशोरियां शामिल हैं। जिले में आठ माह के दौरान 12 से अधिक किशोर और किशोरियों ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की थी लेकिन इसका रिकॉर्ड पुलिस के पास नहीं है। पुलिस का कहना है कि परिवार के लोग अधिकतर मामलों में सूचना नहीं देते हैं।
अस्पताल से ठीक होने पर परिजन अपने बच्चों को लेकर चले जाते हैं। एसपी सिटी अमित श्रीवास्तव का कहना है कि पुलिस को 10 से अधिक लोगों के बारे मे आत्महत्या के प्रयास के बारे में जानकारी मिली थी लेकिन किसी ने लिखित शिकायत नहीं की। परिजनों को भी बच्चों की भावनाओं को समझना चाहिए। बच्चों और परिजनों के बीच दूरी बढ़ने पर इस प्रकार की घटनाएं होती हैं। घटनाओं को रोकने के लिए परिजनों को बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार रखना चाहिए। बच्चों की शंका का समाधान करना चाहिए।
जानकारी के अभाव में नाबालिग करते हैं खुदकुशी
मनोवैज्ञानिक डॉ. नेहा शर्मा का कहना है कि आत्महत्या जानबूझकर खुद से की जाने वाली कोशिश है। ज्यादातर किशोर और किशोरियां तनाव में आकर जान देते हैं। ऐसे बच्चों में सही और गलत जानकारी का अभाव रहता है। वे भावना और विचारों में संतुलन नहीं रख पाते हैं। डॉ. नेहा शर्मा का मानना है कि नाबालिगों के अंदर तनाव ज्यादा तेजी से आता है। पूछताछ से पता चला है कि दोस्ती या अन्य संबंधों के टूटने और पढ़ाई के बोझ के कारण अधिकतर बच्चे तनावग्रस्त हुए हैं। वे उतावलेपन में आत्महत्या का कदम उठाते हैं।
ऐसे होती है बच्चों की पहचान
तनाव ग्रस्त बच्चे नकारात्मक बातें करने लगते हैं। भावना में बहकर रोने लगते हैं। ऐसे बच्चों के अंदर असुरक्षा की भावना घर कर जाती है। आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। किसी काम में मन नहीं लगता है। नींद नहीं आती है और खाने की दिनचर्या में परिवर्तन आ जाता है। बगैर विषय बच्चे रोने लगते हैं। बड़ी बड़ी बातें करते हैं। पढ़ाई भी नहीं करते हैं।
बच्चों में अनुशासनहीनता को न करें नजरअंदाज
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. मनोज त्रिवेदी ने बताया कि अगर बच्चा जल्द क्रोधित हो जाता है। उसके स्वभाव को नियंत्रित करना आसान नहीं है। वह ध्यान नहीं देता है, उसमें अनुशासन की कमी है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे बच्चे कई बार आवेश में आकर कोई भी कदम उठा सकते हैं। वे अपना या किसी दूसरे का नुकसान कर सकते हैं। उनकी काउंसलिंग करानी चाहिए। अगर उससे भी स्थिति सही न हो तो साइकोथैरेपी और दवाई के साथ इलाज किया जाता है।
क्या करें यहां पढ़ें...
-अभिभावकों को बच्चों के अंदर का तनाव दूर करने के लिए भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए।
- नाबालिगों से हर मुद्दे पर बातचीत करनी चाहिए।
-बच्चे से पूछकर उसकी शोक पर ध्यान रखना चाहिए।
-संभव हो तो मनोचिकित्सक की राय लेनी चाहिए ताकि बच्चों को सही ज्ञान कराया जा सके।
-मनोवैज्ञानिक बच्चों की दिनचर्या को ठीक करने और जिंदगी की सच्चाई से अवगत कराते हैं।
- बच्चों को बताया जाना चाहिए कि जीवन में जितना मिला है। उसे खुशी से स्वीकार करें।