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रिसर्चः 200 मीटर ऊंचा हो सकता है माउंट एवरेस्ट

Thu, 08 Oct 2015 06:53 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 08 Oct 2015 06:53 PM IST
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mount everest can be elevated about 200 meters.

हिमालय की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई अधिकतम दो सौ मीटर तक और बढ़ सकती है। इसके बाद एवरेस्ट की ऊंचाई कम होने लगेगी।

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साथ ही एवरेस्ट के आसपास की दूसरी चोटियां जो अभी छोटी हैं, आने वाले 50 लाख सालों में वे एक से दो हजार फिट तक और ऊंची हो सकती हैं। यह कहना है हिमालय पर शोध कर रहे जर्मनी और अमेरिकी विज्ञानियों का। उनका कहना है कि पहाड़ के ऊंचा होने से मिट्टी का कटान और भूस्खलन बढ़ जाएगा।

हिमालय क्षेत्र में 20 साल से शोध कर रहे अमेरिका के साइमन क्लेमपर, डेविड बी राउले और जर्मनी के रैसमस सी थीडे का कहना है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई इस वक्त 8,848 मीटर है, यह अधिकतम 9 हजार मीटर तक जा सकती है। जैसे ही चोटी ऊंची होगी मिट्टी का कटान बढ़ेगा, भूस्खलन और ग्लेशियरों का टूटना तेज हो जाएगा।
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इससे चोटी की ऊंचाई कम होने लगेगी। चोटी की ऊंचाई बढ़ने के साथ तलहटी में दबाव बढ़ेगा जिससे भूगर्भ प्लेटों की चाल बदलेगी।

दबाव के कारण बढ़ सकती है चोटियों की ऊंचाई

mount everest can be elevated about 200 meters.

जर्मनी और अमेरिका के विज्ञानी देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान में आयोजित हिमालय-कराकोरम-तिब्बत कार्यशाला में शिरकत करने आए हैं।

इन विज्ञानियों का अंदाजा है कि माउंट एवरेस्ट के चारों तरफ की चोटियां, जो इस वक्त छोटी हैं दबाव के कारण उनकी ऊंचाई और बढ़ सकती है, लेकिन एक-दो हजार मीटर बढ़ने में 50 लाख साल से ज्यादा समय लगेगा। साइमन क्लेमपर ने बताया कि इंडियन प्लेट हिमालय के नीचे दो सेमी प्रति वर्ष के लिहाज से धंस रही है।

हिमालय में दो हजार साल तक पुराने पेड़
साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियो बॉटनी, लखनऊ के विज्ञानी डॉ. आरआर यादव ने बताया कि हिमालय क्षेत्र में सबसे पुराना पेड़ दो हजार साल का है। यह पेड़ धूप का है। यह समुद्र तल से तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर है।

चिलगोजा का पेड़ 1600 साल पुराना है। राई और फर का पेड़ 600 साल पुराना पाया गया। उन्होंने बताया कि इन पेड़ों के तनों की रिंग की जांच से मानसून का रिकॉर्ड निकाला गया। पेड़ों की रिंग की कोशिकाओं की जांच से पता चला कि वर्ष 1200 से 1560 तक बसंत ऋतु में बारिश कम हुई।

वर्ष 1561 से 1850 तक पश्चिमी हिमालय में खूब बारिश हुई। इसी दौरान ग्लेशियरों की लंबाई अधिकतम बढ़ी थी। इस समयावधि को ‘लिटिल आइस ऐज’ कहा गया।

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