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महकमे की बिगड़ी सेहत सुधारेगी अधिकारियों की फौज!

Sun, 12 Jul 2015 02:42 PM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 12 Jul 2015 02:42 PM IST
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more officer and less doctor in health department.

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त दुरुस्त करने के लिए सरकार को डॉक्टर तो मिल नहीं रहे, लेकिन विभागीय सचिवों की तादात में लगातार इजाफा किया जा रहा है।

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जिस महकमे को दो अपर सचिव और एक सचिव संभालते रहे हैं अब उसमें तीन अपर सचिव रैंक के अधिकारी, एक सचिव और एक प्रमुख सचिव हैं। यही हाल स्वास्थ्य महानिदेशालय का है जहां संयुक्त निदेशक और अपर निदेशकों की भरमार है जबकि पर्वतीय जनपदों में चिकित्सकों की भारी कमी से मरीज इलाज को तरस रहे हैं।
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राज्य गठन के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि स्वास्थ्य महकमे में शासन स्तर पर सचिवों की संख्या इतनी अधिक हुई है। अपर सचिव के स्तर पर बीआर टम्टा और विम्मी सचदेवा है, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के एमडी नीरज खैरवाल तैनात है। विभाग के प्रमुख सचिव ओम प्रकाश गुप्ता के अलावा शुक्रवार को भूपेंद्र कौर औलख को सचिव का प्रभार दिया गया है।
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विभाग में नई योजनाएं की बात दो दूर चल रहे कार्यक्रम भी सुस्त पड़े हैं। अगर मुख्यमंत्री की घोषणाओं की बात की जाए तो बीते दो वर्ष में मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के अलावा कोई अन्य योजना लांच नहीं हुई।

सचल चिकित्सा सेवा में सुधार के लिए सीएम एक वर्ष पहले 13 नए मल्टी स्पेशलिटी सचल वाहन दस्तों की घोषणा कर चुके हैं, लेकिन वह अमल में नहीं आई।

ट्रामा सेंटरों को संचालित करने के लिए सीएम ने उन्हें निजी सहभागिता पर चलाने की बात कही, लेकिन अब तक सिर्फ प्रस्ताव के स्तर पर है। सीएम ने मेहमान चिकित्सक योजना एक वर्ष पहले लांच की, लेकिन अब तक कोई चिकित्सक बतौर मेहमान बनकर नहीं आया।

आपदा के दो वर्ष बाद भी हेल्थ सिस्टम का पता नहीं
जून 2013 में आई आपदा के बाद विश्व बैंक ने राज्य को हेल्थ सिस्टम योजना के तहत स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए लगभग 750 करोड़ की ऋण देने पर सहमति दी थी, लेकिन दो वर्ष बीतने के बाद भी योजना शुरू नहीं हुई। अभी तक विश्व बैंक और प्रदेश सरकार में करार तक नहीं हुआ।


एनएचएम की भी सुस्त चाल
स्वास्थ्य सेवाएं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत केंद्र से मिलने वाली फंडिंग पर निर्भर करती हैं, लेकिन उसकी भी सुस्त रफ्तार चिंता का विषय बनी हुई है। इस वर्ष अन्य राज्य के भेजे प्लान को केंद्र स्वीकृति दे चुका है, लेकिन उत्तराखंड का प्लान लटका हुआ है।

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