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राजधानी के लिए स्थल चयन नहीं तो कैसे मिलेगा पैसा
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 12 Nov 2015 10:42 AM IST
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गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाने को लेकर आज भी कई सवाल खड़े हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। राजधानी के निर्माण के लिए दस हजार करोड़ रुपए कहां से आएगा?
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यदि पैसा केंद्र से लेना है तो सवाल यह है कि राज्य ने ऐसा कौन सा प्रस्ताव केंद्र को भेजकर पैसा मांगा है जिसनें राजधानी के लिए चयनित स्थल का जिक्र हो। और, यदि ऐसा नहीं किया गया तो केंद्र कौन से स्थान पर बनने वाली राजधानी के लिए पैसा देगा।
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किसी भी राज्य की राजधानी हो, सबसे पहला काम स्थलीय चयन का होता है। स्थलीय चयन होने के बाद फिर राजधानी निर्माण की डीपीआर तैयार कर केंद्र से पैसा मांगा जाता है, लेकिन उत्तराखंड में उल्टा हो रहा है, यहां पर मुख्यमंत्री हरीश रावत केंद्र से पैसा तो मांग रहे है, लेकिन राजधानी कहां बनेगी यह जिक्र नहीं किया।
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अभी तक केंद्र को ऐसा कोई प्रस्ताव राज्य सरकार की तरफ से आज तक नहीं गया जिसमें राजधानी के लिए चयनित स्थल हो और उसके लिए केंद्र से धनराशि मांगी गई हो। अब सवाल यह है कि केंद्र यदि पैसा दे भी तो कौन सी जगह के लिए दे।
देहरादून के लिए या फिर गैरसैंण के लिए। आज भी केंद्रीय कार्मिक राज्यमंत्री से राजधानी के लिए मुख्यमंत्री ने इंफ्रास्ट्र्क्चर के नाम पर तो पैसा मांगा, लेकिन राजधानी कहां बनेगी यह अभी भी तय नहीं तो केंद्र पैसा क्यों देगा।
वन-डे की तरह खेला जाता है राजधानी का मैच
अपने मुख्यमंत्रित्व काल में विधानसभा सत्र के दौरान वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नारायणदत्त तिवारी ने कहा था कि राजधानी उसी स्थान पर बननी चाहिए जो हर तरह से विकसित हो। विगत दिवस संसदीय कार्यमंत्री इंदिरा ह्दयेश का देहरादून में राजधानी बनाने का बयान भी तिवारी केकथन को बल देता है।
दरअसल, कांग्रेस और भाजपा दोनों ही गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाने को लेकर वन-डे क्रिकेट की तरह पेश आते हैं, जब भी मुद्दा उठता है तो दोनों अपनी अपनी पाली खेलकर निकल लेते हैं। पंद्रह साल में करीब छह साल भाजपा और नौं साल कांग्रेस राज कर चुकी है। भाजपा इस मुद्दे पर इतनी आक्रामक इसलिए भी है।
क्योंकि भाजपाई अच्छी तरह जानते हैं कि गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित करने के पीछे तमाम तकनीकी मजबूरियां है। सदन के भीतर गैरसैंण को राजधानी बनाने के भाजपा के मदन कौशिक के प्रस्ताव भारी मतों से गिरा देना इस बात का सबूत है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर रक्षात्मक मुद्रा में है।
आंध्र ने एक ही साल में निकाल लिया रास्ता
जून 2014 में आंध्र प्रदेश से विभाजित होकर तेलंगाना नया स्टेट बना। इस दौरान आंध्र को अपनी राजधानी का चयन करना था। आंध्र ने करीब एक साल बाद आमरावती के नाम से नई राजधानी बनाने की घोषणा की और 22 अक्तूबर 2015 को प्रधानमंत्री से फाउंडेशन स्टोन भी रखवा दिया। आमरावती आंध्र के ही गुंटूर जनपद का हिस्सा है जो कि कृष्णा नदी पर स्थित है।
राजधानी मामले में झारखंड व छत्तीसगढ़ आगे
उत्तराखंड के साथ जिन दो अन्य राज्यों झारखंड व छत्तीसगढ़ का उदय हुआ था वहां राजधानी का संकट क्यों खड़ा नहीं हुआ, यह भी सोचने वाली बात है। झारखंड ने रांची और छत्तीसगढ़ ने रायपुर को राजधानी बनाकर विकसित भी कर दिया और उत्तराखंड में राजधानी के लिए स्थल चयन को लेकर चल रही एक्सरसाइज पंद्रह सालों में भी पूरी नहीं हो सकी।