{"_id":"f032f20b02f091a7807ca20e0b36ef29","slug":"mistake-in-dehradun-master-plan","type":"story","status":"publish","title_hn":"खामियों का पुलिंदा बना दून का मास्टर प्लान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खामियों का पुलिंदा बना दून का मास्टर प्लान
अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 08 Dec 2013 03:30 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राजधानी देहरादून का संशोधित मास्टर प्लान खामियों का पुलिंदा बनकर रह गया है।
विज्ञापन
प्लान चला तो दून के जंगलों में खेती होने लगेगी। जी हां, राजपुर में दानियों का डांडा के पास स्थित जंगल को कृषि भूमि में दर्शा दिया गया है। खास बात यह है कि यहां समतल जमीन नहीं, बल्कि पहाड़ को खेत दिखाया गया है।
पास ही स्थित एक संस्था का गेस्ट हाउस भी खेत बताया है। प्लान में सामने आ रही इस तरह की खामियों से जहां आम आदमी परेशान है, वहीं भूमाफिया और बिल्डरों को यह चांदी काटने का जरिया नजर आ रहा है।
विज्ञापन
यह सवाल भी उठने लगा है कि प्लान में सिर्फ मालदार लोगों का ध्यान रखा गया है। उन लोगों को लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई है, जिनकी पहुंच मंत्री या विधायकों तक थी।
विज्ञापन
शासन, नगर एवं ग्राम्य नियोजन विभाग मेहरबान
आईटीबीपी से रेडियल रोड के बीच 70 बीघा से अधिक जमीन का भूउपयोग वर्ष 2008 के मास्टर प्लान में सार्वजनिक था। संशोधित प्लान में इसे आवासीय दिखाया गया है।
बताया जा रहा है कि यह जमीन एक सिनेमाहॉल मालिक की है, जिस पर शासन और नगर एवं ग्राम्य नियोजन विभाग मेहरबान है। दूसरी ओर, कारगी ग्रांट के पास आम लोगों की सैकड़ों एकड़ जमीन का भू उपयोग सार्वजनिक और अर्द्ध सार्वजनिक रखा गया है।
नकरौंदा के पास कुछ बिल्डरों की जमीन है। यहां एक बड़े उद्योगपति की भी जमीन है। पहले यहां भू उपयोग व्यावसायिक था, जिसे बदलकर आवासीय और फिर संशोधित कर औद्योगिक कर दिया गया।
खास बात यह है कि मास्टर प्लान में यहां नदी का भी आकार बदल दिया गया है। गूगल मैप, पुराने मास्टर प्लान और नए मास्टर प्लान में मौके पर स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है।
खेल के चक्कर में हुआ फेल
संशोधित मास्टर प्लान के फेल होने के पीछे दो अफसरों का खेल बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक दिसंबर 2011 में जारी नीति के अनुरूप प्लान बनता तो कहीं दिक्कत नहीं होती।
लेकिन, शासन स्तरीय दो अधिकारियों की मिलीभगत से इसे इतना तोड़-मरोड़ दिया गया है कि अब प्लान में हर जगह गलतियां ही सामने आ रही हैं। स्थिति यह है कि मौजूदा स्वरूप में तो इसे लागू कर पाना नामुमकिन है।
संशोधित मास्टर प्लान में पुराने प्लान की खामियों को दूर किया जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पिक एंड चूज के आधार पर सिर्फ भू उपयोग बदला गया है, जिससे तमाम विसंगतियां सामने आ रही हैं।
- डीएस राणा, महासचिव, उत्तरांचल इंजीनियर्स एवं ड्राफ्ट्समैन वेलफेयर एसोसिएशन