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अस्पतालों में फिर गहराने लगा दवा का संकट
ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 25 Nov 2016 02:10 AM IST
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medicine
- फोटो : File
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प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में दवाओं का संकट फिर गहराने लगा है। स्वास्थ्य महानिदेशालय के स्तर से भी दवाओं की खरीद न हो पाने के कारण यह दिक्कत हुई है। मुख्य चिकित्साधिकारियों के स्तर से पहले ही दवाओं की खरीद नहीं हो पा रही है। ऐसे में रोगियों की परेशानी बढ़ने लगी है।
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प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में पिछले करीब एक वर्ष से मनोरोग और मिर्गी की दवा का स्टॉक खाली है। महानिदेशालय में भी दवा न होने के कारण अस्पतालों को आपूर्ति नहीं हो रही है। इसके चलते मनोरोग और मिर्गी रोगियों को बाजार से महंगे दाम पर दवा खरीदनी पड़ रही है।
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वहीं नवजात शिशुओं और बहुत छोटे बच्चों को द्रव्य के रूप में दी जाने वाली ज्यादातर दवाएं भी खत्म हो गई हैं। एंटी रैबीज वैक्सीन का स्टॉक भी खत्म है। अस्पतालों में ज्यादातर मरीजों को वैकल्पिक दवा दी जा रही है। औषधि क्रय नीति की विसंगतियों और जटिल शर्तों के कारण यह समस्या बनी है।
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बाहरी कंपनियों का सालाना 70 करोड़ रुपये के टर्न ओवर और 23 फीसदी कम कीमतों पर दवा देने जैसी शर्तों के चलते फर्म दवा आपूर्ति में दिलचस्पी नहीं ले रही हैं। इसके चलते सीएमओ स्तर पर दवाओं की खरीद नहीं हो पाई है। नीति में संशोधन की कवायद लंबे समय से चल रही है, लेकिन अभी तक कोई निर्णय नहीं हो सका है।
बजट खत्म होने के चलते दवाओं की खरीद नहीं हो पा रही है। हमने दवा खरीदने के लिए बजट की मांग की है।
-डॉ. कुसुम नरियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक