सरकारी दवा कारखाने को 'दुआ' की दरकार
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उत्तराखंड में कई संस्थान इकलौते हैं। सबकी कहानी एक है, सभी बदहाल हैं। उत्तराखंड के 14वें स्थापना दिवस पर ऐसे ही कुछ संस्थानों की पड़ताल की गई। इसी की अगली कड़ी में पेश है ऋषिकेश स्थित सरकारी दवा कंपनी आईडीपीएल की बदहाली की कहानी।
अरसे से बीमार चल रही ऋषिकेश में स्थापित विख्यात सरकारी दवा निर्माता कंपनी आईडीपीएल (इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड) को दवा की दरकार है।
कई सस्ती जीवनरक्षक और सस्ती दवाएं बनाने वाली यह कंपनी कितनी विशाल थी, इसी बात से जाना जा सकता है कि यहां पांच हजार स्थायी कर्मचारी थे, अब 42 ही बचे हैं।
अब इस कंपनी से स्थायी उत्पादन नहीं होता। कभी-कभार आर्डर मिलता है तो यहां दवाइयां बन जाती हैं। राज्य के नेताओं ने आईडीपीएल के उद्धार के लिए केंद्र से कई बार पैरवी भी की है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है।
आईडीपीएल उस दौर में स्थापित हुई थी जब केंद्र सरकार विदेशी सहयोग से धड़ाधड़ बड़े सार्वजनिक उपक्रम स्थापित कर रही थी।
गरीबों को दवा मुहैया कराने के लिए बनी कंपनी
भारत और तत्कालीन सोवियत संघ के सहयोग से गरीबों को सस्ती दवाएं मुहैया कराने के मकसद से ऋषिकेश के वीरभद्र 1962 में इंडियन ड्रग्स फार्मास्युटिकल लि. (आईडीपीएल) फैक्ट्री का शिलान्यास किया गया था।
1967 में फैक्ट्री में उत्पादन शुरू हो गया था। शुरुआती डेढ़ दशक में यहां पैंसिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लीन, एंटी फंगल टैब्लेट जैसी महत्वपूर्ण दवाएं तैयार करके पूरे देश में भेजी जाती थी।
1980 के आसपास आईडीपीएल का बेहतर संचालन हुआ। उदारीकरण के दौर में सार्वजनिक संस्थानों से सरकारों के हाथ खींचने और प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा देने का नतीजा आईडीपीएल ने भी भुगता।
कर्मचारियों को जबरन रिटायरमेंट देना, छंटनी आदि के चलते मानव संसाधन तो घटा ही, एक वक्त फैक्ट्री में उत्पादन भी पूरी तरह से ठप हो गया। इसे बीमारू फैक्ट्री बताकर ब्यूरो आफ इंडस्ट्रीयल फाइनेंशियल रिकंस्ट्रशन (बीआईएफआर) को रेफर कर दिया।
विशाल फैक्ट्री का सुनहरा अतीत
इस विशाल फैक्ट्री के करीब एक हजार क्वार्टर खाली पड़े हैं। इनमें अधिकांश देखरेख के अभाव में गिरासू हो चुके हैं। संस्थान के सूत्रों की मानें तो लगातार उत्पादन के लिए फैक्ट्री को नए सिरे से पुनर्स्थापित करना होगा जिसमें करोड़ों रुपये खर्च होने की आवश्यकता है।
गुजरात के सूरत में 1985 में फैले प्लेग के दौरान कोई संस्थान दवा बनाने को तैयार नहीं हुआ, ऐसी स्थिति में आईडीपीएल से बनाकर प्लेग की सारी दवाओं की आपूर्ति की गई ।
फैक्ट्री की यात्रा
1962 में शिलान्यास, 1967 में उत्पादन की शुरुआत
1976-77 में फैक्ट्री में 4500 नियमित कर्मचारी और 500 वर्क चार्ज थे
1992 में फैक्ट्री को बीमारू इकाई करार दिया गया
वर्तमान में फैक्ट्री में 42 अधिकारी, 16 अनुबंध पर
आउट सोर्सिंग पर कांट्रैक्ट के जरिए 300 श्रमिक कार्यरत
यह है समाधान
वर्तमान में आईडीपीएल रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन आता है, जानकारों की मानें तो यदि संस्थान को स्वास्थ्य मंत्रालय अपने अधीन ले तो सरकार द्वारा निशुल्क दी जाने वाली दवाओं का उत्पादन यहां हो सकता है।
इससे केंद्र सरकार को भी निशुल्क दवाओं को निजी संस्थानों से अधिक दाम पर खरीदना नहीं पड़ेगा। इससे करोड़ों की धनराशि बचेगी।
क्या कहता है प्रबंधन
2013-14 में आईडीपीएल ने आर्डर मिलने पर 22 करोड़ रुपये की दवाओं का उत्पादन किया जो करीब दो दशक का रिकॉर्ड उत्पादन है। इसके लिए हमें डब्लूएचओ जीएमपी सर्टिफिकेट से नवाजा गया है। यह उत्पादन कंपनी में 25 वर्ष पहले होता था। अब हम दवाओं को एक्सपोर्ट भी कर सकते हैं।
- जीएस बेदी, महाप्रबंधक आईडीपीएल