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सैनिकों की जंग: आतंकियों से लोहा लेते वक्त शहीद हुए थे शिशिर, नहीं बना शहीद द्वार
Sat, 23 Feb 2019 11:11 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Sat, 23 Feb 2019 11:11 AM IST
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सरहद पर अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने के बाद आम नागरिक की भूमिका में आए प्रदेश के हजारों पूर्व सैनिकों की सुविधाओं से जुड़े मसले सरकारी तंत्र में उलझकर दम तोड़ रहे हैं। अमर उजाला ने इन मसलों की गहराई में जाकर उन्हें जिम्मेदारों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। यदि आपके पास भी पूर्व सैनिकों की दिक्कत से जुड़ी कोई भी जानकारी है तो उसे साझा कर सकते हैं।
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शहीद द्वार न बनने से दु:खी है मां
देश के लिए शहीद दून के लाल शिशिर मल्ल के नाम का द्वार सालों बाद भी नहीं बन सका है। सरकार ने इसकी घोषणा तो की, लेकिन वह फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी। वहीं बेटे के नाम का द्वार नहीं बनने से मां दु:खी है। हम बात कर रहे हैं साल 2015 में आतंकियों से लोहा लेते हुए कश्मीर में शहीद होने वाले दून के लाल शिशिर मल्ल की। वे 32 राष्ट्रीय राइफल्स में राइफलमैन थे।
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शहीद मल्ल की माता रेणू मल्ल ने बताया कि बेटे के शहीद होने के बाद सरकार ने चंद्रबनी में शहीद द्वार निर्माण करने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि पूरा परिवार सेना में जाकर देश की सेवा कर रहा है। पति स्व.सुरेश मल्ल सेना में सूबेदार मेजर थे, जबकि छोटा बेटा सुशांत मल्ल भी सेना में है। अब बहू भी सेना में भर्ती हो गई है। शहीद मल्ल की पत्नी संगीता मल्ल एक साल पहले ही सेना में भर्ती हुई हैं। वर्तमान में वह पुणे में ट्रेनिंग कर रहीं हैं। इस साल 17 मार्च को उनकी ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी। बावजूद इसके सालों बाद भी सरकार की ओर से बेटे शिशिर मल्ल के नाम का शहीद द्वार नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि जब भी वह इस रास्ते से निकलती हैं तो उन्हें अपने बेटे की याद आती है। बेटा अक्सर कहता था कि देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति भी देनी पड़े तो मंजूर है। बेटे ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया, लेकिन सरकार से एक शहीद द्वार तक नहीं बनाया गया। सरकार के झूठे वादे से उनका मन बहुत दुखी होता है। शहीद शिशिर मल्ल के चचेरे भाई पारस मल्ल ने बताया कि शहीद द्वार के संबंध में कई बार क्षेत्रीय विधायक से भी बात की गई। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
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फोन की घंटी के साथ बढ़ जाती हैं धड़कनें
शहीद शिशिर की मां रेणू मल्ल कहतीं हैं कि छोटा बेटा सुशांत मल्ल भी सेना में है। पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से बेटे का जब भी फोन आता है तो उनकी धड़कनें बढ़ जाती हैं। उन्होंने बताया कि बीते बृहस्पतिवार सुबह ही बेटे ने फोन कर अपने सकुशल होने की खबर दी थी। वर्तमान में वह 1/11 गोरखा राइफल्स में तैनात है।
पूर्व सैनिकों के साथ सरकार का सौतेला व्यवहार
सेना से सेवानिवृत्त राजेश थापा ने कहा कि सरकार पूर्व सैनिकों के साथ सौतेला व्यवहार करती है। उन्होंने कहा कि वन रैंक वन पेंशन को लेकर सरकार पूर्व सैनिकों को गुमराह करने का काम कर रही है। पूर्व सैनिकों की पेंशन में अभी भी कई तरह की विसंगति है।
ओआरओपी लागू होने से पेंशन विसंगति बनी सिरदर्द
ओआरओपी लागू होने के बाद पेंशन की विसंगति पूर्व सैनिकों के लिए सिरदर्द बन गई है। पेंशन में कई-कई हजार रुपये का अंतर आने से हर तरफ बेचैनी है। पूर्व सैनिकों का केंद्रीय नेतृत्व दिल्ली में इसके लिए संघर्षरत है। प्रधानमंत्री के 25 फरवरी को दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम पर सबकी निगाहें टिकी है। पूर्व सैनिकों को उस दिन राहत देने वाली घोषणाएं होने की उम्मीद है।
वन रैंक -वन पेंशन के स्वरूप को लेकर पूर्व सैनिक सबसे ज्यादा उद्देलित है। इंटरनेट पर इस बारे में सवालाें की बौछार है। ज्यादातर शिकायतें मेजर, ले.कर्नल और फैमिली पेंशन से जुड़ी है। पेंशन विसंगतियों को लेकर प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और तीनों सेना प्रमुखों को अनेक बार ज्ञापन दिए जा चुके हैं। बिग्रेडियर केजी बहल (सेवानिवृत्त) का कहना है कि सरकार ने ओआरओपी की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। नई व्यवस्था से पेंशन में छह से आठ हजार रुपये का अंतर आ गया है। मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) सतबीर सिंह के नेतृत्व में काफी समय से इन विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह के हालात बने हैं, उसके बाद सरकार ओआरओपी में क्रियान्वयन में जल्द राहत देने वाला कोई बड़ा फैसला ले सकती है।