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घोषणा के पांच साल बाद भी शहीद के परिजन को नहीं मिली नौकरी
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प्रदेश सरकार भले ही शहीदों के सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन हकीकत यह है कि शहीदों को लेकर सरकार के वादे और घोषणाएं कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। इसका उदाहरण नवादा निवासी शहीद राइफलमैन संदीप रावत का परिवार है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 2016 में शहीद के घर जाकर एक परिजन को नौकरी देने की घोषणा की थी। शहीद का परिवार पांच साल से मुख्यमंत्री की इस घोषणा को लेकर दर-दर भटक रहा है, लेकिन आज तक राहत नहीं मिल पाई। इससे शहीद का परिवार खुद को ठगा महसूस कर रहा है। दरअसल, गढ़वाल राइफल्स की छटी बटालियन में तैनात राइफलमैन संदीप रावत तंगधार सेक्टर में अक्तूबर 2016 में शहीद हो गए थे। संदीप का परिवार मूल रूप से पौड़ी जनपद के धूमाकोट क्षेत्र के घोड़पाला गांव का रहने वाला है। वर्ष 2004 से वह नवादा क्षेत्र में रह रहे हैं। उनके परिवार में मां-बड़ा भाई और पिता थे, लेकिन पूर्व सैनिक पिता की भी मौत हो गई। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत शहीद के घर पहुंचे थे। उन्होंने सांत्वना देते हुए परिवार के एक सदस्य को नौकरी की घोषणा की थी।
पांच साल बाद भी शहीद का परिवार नौकरी के लिए जिला सैनिक कल्याण विभाग से लेकर तमाम सरकारी कार्यालयों, नेताओं और अधिकारियों के चक्कर लगा रहा है। ऐसे में शहीदों के सम्मान के वादों में कितनी हकीकत है, इसका अंदाजा इस परिवार को देखकर लगाया जा सकता है।
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तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 2016 में शहीद के घर जाकर एक परिजन को नौकरी देने की घोषणा की थी। शहीद का परिवार पांच साल से मुख्यमंत्री की इस घोषणा को लेकर दर-दर भटक रहा है, लेकिन आज तक राहत नहीं मिल पाई। इससे शहीद का परिवार खुद को ठगा महसूस कर रहा है। दरअसल, गढ़वाल राइफल्स की छटी बटालियन में तैनात राइफलमैन संदीप रावत तंगधार सेक्टर में अक्तूबर 2016 में शहीद हो गए थे। संदीप का परिवार मूल रूप से पौड़ी जनपद के धूमाकोट क्षेत्र के घोड़पाला गांव का रहने वाला है। वर्ष 2004 से वह नवादा क्षेत्र में रह रहे हैं। उनके परिवार में मां-बड़ा भाई और पिता थे, लेकिन पूर्व सैनिक पिता की भी मौत हो गई। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत शहीद के घर पहुंचे थे। उन्होंने सांत्वना देते हुए परिवार के एक सदस्य को नौकरी की घोषणा की थी।
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पांच साल बाद भी शहीद का परिवार नौकरी के लिए जिला सैनिक कल्याण विभाग से लेकर तमाम सरकारी कार्यालयों, नेताओं और अधिकारियों के चक्कर लगा रहा है। ऐसे में शहीदों के सम्मान के वादों में कितनी हकीकत है, इसका अंदाजा इस परिवार को देखकर लगाया जा सकता है।
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