उत्तराखंड में कई तरह से मनाया जाता है संक्रांत, इस प्रसिद्ध स्पर्धा में सात लाश माफ!
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निखिल चौहान, कोटद्वार
पौड़ी गढ़वाल में मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होने वाला गेंद मेला (गिंदी कौथिग) का अपना अलग ही महत्व है। गढ़वाल में यह मेला थलनदी, डाडामंडी, देवीखेत, दालमीखेत, मवाकोट व सांगुड़ा बिलखेत आदि कई स्थानों पर होता है, लेकिन थलनदी और डाडामंडी का गेंद मेला सबसे प्रसिद्ध है। इस बार भी गेंद मेलों के आयोजन को लेकर क्षेत्र में उत्साह बना हुआ है। थलनदी में गिंदी कौथिग के तहत सोमवार को गेंद खेली जाएगी, जबकि डाडामंडी और मवाकोट में 15 जनवरी को गेंद खेली जाएगी। गेंद मेले के तहत कई दिन पूर्व से खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन चल रहा है।
स्थानीय लोगों द्वारा कहा जाता है कि डाडामंडी के गिंदी मेले गिंदी खेलते वक्त अगर सात लाश यानी 07 मौत भी हो जाएं तो वो भी माफ़ हैं। और वहीं थलनदी के गिंदी मेले में 5 लाश तक माफ़ मानी जाती हैं। हालाँकि अभी तक ऐसा सुनाई नहीं दिया है कि इस खेल में किसी की मौत हुई हो।
पौराणिक कथाओं के अनुसार थलनदी से ही गेंद मेले की शुरुआत हुई थी। थलनदी और डाडामंडी के गेंद मेलों को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। गेंद मेला एक मल्ल युद्ध की तरह दो पट्टी के लोगों के बीच बीच खेला जाता है। इस खेल का न तो कोई नियम है और न ही खिलाड़ियों की संख्या निर्धारित है। मेले का मुख्य आकर्षण एक चमड़े की गेंद होती है, जिसके चारों तरफ एक एक कंगन मजबूती से लगे होते हैं। यह खेल खुले खेतों में खेला जाता है। दोनों पट्टियों के लोग निर्धारित स्थान पर ढोल-दमाऊं और नगाड़े बजाते हुए अपने-अपने क्षेत्र के ध्वज लेकर एकत्र होते हैं। खेल शुरू होने से पूर्व पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है।
जिस पक्ष के लोग गेंद बनवाकर लाए होते हैं वे लोग गेंद को हवा में उछालते हैं और यहीं से शुरू हो जाती है गेंद को लपककर अपने क्षेत्र की सीमा में फेंकने की जद्दोजहद। दोनों पक्षों के लोग गुत्थमगुत्था होकर गेंद की छीना झपटी शुरू कर देते हैं। सबका एक ही लक्ष्य होता है, गेंद को छीन कर अपनी सीमा में ले जाना। लंबे संघर्ष, छीना-झपटी, धक्का-मुक्की और तनातनी के बाद किसी एक क्षेत्र के खिलाड़ी जब गेंद को अपने क्षेत्र की तरफ फेंक देते हैं तो उस क्षेत्र के खिलाड़ियों को विजय घोषित कर दिया जाता है। जीतने वाली टीम नाचते गाते हुए गेंद को अपने साथ ले जाती है। थलनदी में जहां अजमीर और उदयपुर पट्टियों के बीच गेंद खेली जाती है, वहीं डाडामंडी में लंगूर और भटपुड़ी पट्टियों के बीच गेंद खेली जाती है।
बागेश्वर का ऐतिहासिक उत्तरायणी मेला
पौराणिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और व्यापारिक महत्व का बागेश्वर का उत्तरायणी मेला आज से शुरू हो गया है। वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने नुमाइश खेत में मेले का विधिवत शुभारंभ किया।
सरयू, गोमती, सरस्वती के संगम पर 14 से 21 जनवरी तक लगने वाले इस मेले की तैयारियां पूरी कर ली गईं हैं। शहर के प्रवेश द्वार और मेला स्थल को दुल्हन की तरह सजाया गया है। भगवान बागनाथ, काल भैरवनाथ समेत सभी देवी देवताओं के मंदिरों में भी भव्य सजावट की गई है। इधर, उत्तर भारत के एकमात्र सूर्य मंदिर कटारमल में 15वें सूर्य पर्व का भी शुभारंभ हुआ। केंद्रीय कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा ने इसका उद्घाटन किया। सूर्य पर्व पर रविवार को करीब आठ हजार से अधिक भक्तों ने मंदिर में भगवान सूर्य के चरणों में शीश झुकाया।
इधर, कुमाऊं-गढ़वाल के रानीखेत, द्वाराहाट, भिकियासैंण, लमगड़ा, बासोट (भिकियासैंण), धूमाकोट, रामनगर, चौखुटिया, पौड़ी से रानीबाग (काठगोदाम) पहुंचे कत्यूरी वंशजों ने आराध्य और कुल देवी जियारानी की पूजा, अर्चना की। उन्होंने गार्गी नदी में स्नान करने के बाद जियारानी की गुफा में पूजा की और रात्रि में जागर लगाया। कुल देवी से कष्ट निवारण की मन्नत मांगी।
कुमाऊं का प्रसिद्ध घुघुतिया त्योहार
कुमाऊं में मकर संक्रांति के मौके पर घुघुतिया त्योहार मनाया जाता है। इस दिन गुड़ व चीनी मिलाकर आटे को गूंथा जाता है। फिर घुघते बना उसे घी या तेल में तलकर उसकी माला बनाते हैं।
बच्चे इन मालाओं को गले में पहन का कौवों को 'काले कव्वा काले, घुघुती मावा खाले' कहकर बुलाते हैं।
इस दिन बेटियां अपने मायके आती हैं और उपहार पाती हैं। वहीं जो बेटियां मायके नहीं आ पाती उनके लिए सुसराल में घुघुतियां पहुंचाया जाता है।
दान की जाती है खिचड़ी
उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में मकर संक्रांति पर 'खिचड़ी पर्व' मनाया जाता है। इस दिन सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है।
एक महीने तक मनाया जाता है मरोज पर्व
जौनसार बावर जनजातीय क्षेत्र में इन दिनों माघ पर्व (मरोज पर्व) चल रहा है। जनवरी में मनाए जाने वाले इस त्योहार का लोग साल भर से इंतजार करते हैं। त्योहार को लेकर लोग बकरे खरीद रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों ने घर पर बकरे पाले हुए हैं। क्षेत्र में त्योहार को लेकर लोग बकरों की खरीदारी करने में जुटे है। 25 से 30 हजार रुपये तक बाजार में बकरे खरीदे जा रहे हैं। प्रत्येक परिवार को एक बकरे को काटने की परंपरा है, जो वर्षों पूर्व से चली आ रही है।
इस पर्व में रिस्तेदारी को निभाने के लिए एक दूसरे के यहां जाने का रिवाज है। क्षेत्र के नराया, अलसी, कोठा, अष्टी, पजेटिलानी, टिपऊ, जिसऊ, बाणाधार, चिल्हाड़, टयूटाड, खरोटा, झबराड, लाखामंडल, बुरासुवा, मेहपोटा, क्वासी आदि क्षेत्रों में पर्व मनाया गया। मरोज के दिन बकरों को काटा जाता है। पंजिया गाँव के संतराम भट्ट, अलसी गाँव के सिंगा राम बिष्ट आदि बुजुर्गों का कहना है कि बकरों को काटने की माघ माह की संक्रांति से दो दिन पूर्व की परंपरा कई सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा को आज भी मनाया जा रहा है। इसके लिए पूरे साल भर घर में बकरे को पाला जाता है।
पूरे महीने मनाया जाएगा त्योहार
माघ माह में काटे जाने वाले बकरे का मांस प्रत्येक घर से विवाहिता महिलाओं के ससुराल के साथ ही भांजे को बाटे (हिस्सा) के रूप में दिया जाता है। 11 और 12 जनवरी को मरोज पर्व मनाया जाएगा। जबकि इसके बाद मसांद, खोडा, पाऊंणाई, सुईणात, बोईदाणा सहित कई त्योहार मनाए जाएंगे। क्षेत्र में पूरे माह त्योहार मनाया जाता है।