आपदाः 6 माह बाद अपनी जमीन पर 'रिफ्यूजी' हैं लोग
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आपदा से निपटने और मुआवजे का ठोस मैकेनिज्म तैयार किए बगैर आपदा के मारों की जिंदगी ढर्रे पर लाने के सरकारी प्रयास कारगर नहीं हो पा रहे हैं। तभी तो बीते दो वर्षों में उत्तरकाशी जिले में 27 करोड़ रुपये राहत सहायता के नाम पर बांटने के बाद भी न तो आपदा पीड़ितों को छत मयस्सर हो पाई और न ही आपदा की भेंट चढ़ी आजीविका ढर्रे पर लौट पाई है।
केस एक
जोशियाड़ा के दिनेश उप्पल ने बैंक से 28 लाख रुपये कर्ज लेकर 30 कमरों का होटल बनाया था। इसमें उनका घर भी था। घर, होटल एवं फर्नीचर की दुकान जून 2013 की बाढ़ की भेंट चढ़ गई। सरकार ने दो लाख रुपये मुआवजा, अहेतुक सहायता एवं चार माह का किराया दिया। होटल का मुआवजा अब तक नहीं मिला है। अब दिनेश परिवार के साथ किराये के दो कमरों में रह रहा है। होटल और दुकान से करीब तीन लाख रुपये सालाना कमाने वाले इस युवक के पास अब आजीविका का कोई साधन नहीं है।
केस दो
जून 2013 की बाढ़ में जोशियाड़ा स्थित अपना घर और परिवार की आजीविका का साधन भोजनालय गवांने वाले अवतार सिंह गुसाईं के सामने अपने गांव बौंगाड़ी लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा। घर-दुकान जाने पर सरकार से उसे अहेतुक सहायता एवं दो लाख रुपये मुआवजा मिला।
घोषणा के अनुसार उसे न तो किराया मिला और न ही ढाबे का मुआवजा। बच्चे शहर के स्कूल में पढ़ते हैं, इसलिए उनके लिए जोशियाड़ा में कमरा किराये पर लिया है। मुआवजे से जिंदगी नहीं चलने वाली, इसलिए अवतार एक बार फिर गांव लौटकर असिंचित खेतों में पसीना बहाने को मजबूर है।
केस तीन
अगस्त 2012 की बाढ़ वन विकास निगम में चौकीदार मोहन सिंह राणा पर भारी पड़ी। बाढ़ ने उनकी बेटी एवं नाती की जान ली और सिर छिपाने की छत छीन ली। बाढ़ में बचे रह गए दो कमरों को किसी तरह ठीक कर उसमें रहना शुरू किया तो जून 2013 की बाढ़ ने वह भी नहीं छोड़ा। सरकार ने पिछले साल ही उन्हें दो लाख रुपये मुआवजा देकर इतिश्री कर ली। इतने में घर तो क्या जमीन भी नहीं मिल रही। अब मोहन सिंह अपने पांच सदस्यीय परिवार के साथ गंगोरी स्थित जल विद्युत निगम कालोनी में बने रिफ्यूजी कैंप में ही दिन गुजारने को मजबूर है।
प्रशासन का दावा मुआवजा बांट दिया, लेकिन...
उत्तरकाशी। अगस्त 2012 की बाढ़ के बाद जिले में बाढ़ पीड़ितों को 6.90 करोड़ और जून 2013 की बाढ़ के बाद 20.14 करोड़ रुपये मुआवजा बांटा जा चुका है। प्रशासन का दावा है कि आपदा पीड़ितों को शतप्रतिशत मुआवजा बांटा जा चुका है। सरकारी दावे कुछ भी हों, लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि अभी तक आपदा पीड़ितों को न तो छत नसीब हो पाई है और न ही आजीविका के साधन ढर्रे पर लौटे हैं। साथ ही अगली बरसात में तबाही का दायरा और फैलने का खतरा अलग है। जानकारों का मानना है कि सिर्फ मुआवजा बांटने भर से काम नहीं चलने वाला।
आर्थिक मदद तो मिली पर मकान कहां बनाएं
नई टिहरी। 16-17 जून की आपदा से जाखणीधार प्रखंड में ग्राम मठियाली के अनुसूचित जाति के 12 परिवार भी बेघर हुए है। टिपरी-चाह मोटर मार्ग से आए भारी मलबे से आवासीय भवन जर्जर स्थिति में पहुंच गए थे। खतरे को देखते हुए उन्होंने घर छोड़कर सरकार की ओर से मिले टेंटों में शरण ली। जो अब तक वहीं गुजर-बसर कर रहे हैं।
प्रशासन की ओर से राहत के तौर पर एक-एक लाख रुपये की मदद तो मिली, लेकिन अब उनके सामने मकान बनाने के लिए सुरक्षित भूमि की समस्या आडे़ आ रही है। गांव के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रताप सिंह राणा, मुकेश लाल, किशन लाल और अर्जुन लाल ने डीएम को दिए ज्ञापन में बताया कि पुस्तैनी मकान मलबे से जर्जर हो गए, वहां भूमि भी सुरक्षित नहीं रह गई है। सरकार की ओर से कुछ आर्थिक मदद तो मिली लेकिन मकान बनाने के लिए भूमि नहीं है।
छह माह बीते, न मुआवजा मिला न रोजगार
कर्णप्रयाग। आपदा के छह महीने बाद भी प्रभावितों को मरहम नहीं मिल पाया है। दूसरों को रोजगार देने वाले आज खुद बेरोजगार हैं। नारायणबगड़ और थराली में आपदा से सीधे प्रभावित हुए साठ से अधिक दुकानदारों में अब भी 20 से अधिक रोजगार के लिए भटक रहे हैं। घरों का चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो रखा है।
प्रभावित धीरेंद्र का कहना है कि जून में आई आपदा ने मुझे बेरोजगार के साथ बेघर भी कर दिया। बूढ़ी मां को मजबूरन गांव भेजना पड़ा। गैरसैंण के सारकोट गांव के सात युवा भी केदारनाथ आपदा में काल के ग्रास बन गए थे। इन युवाओं में कई अपने घर के इकलौते कमाऊ थे। लेकिन अब परिवार का बोझ महिलाओं पर आ गया है।
जीवन को पटरी पर लाने का किया प्रयास
थराली में मोबाइल और रेडीमेड कपड़ों की दुकान चलाने वाले संदीप कुमार तथा सब्जी व जनरल स्टोर मालिक राजेंद्र सिंह सहित नारायणबगड़ के राम सिंह की दुकानें भी जून में आपदा के कहर से ढह गई थी। प्रशासनिक स्तर से मदद न मिलने से परिजनों सहित सगे-संबंधियों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाए। अब भले ही इन लोगों के पास पूर्व जैसी अपनी बड़ी दुकानें तो नहीं हैं। लेकिन वे वक्त के दिए दर्द से उभरते हुए अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।
क्षतिग्रस्त भवनों पर ही नई जिंदगी की शुरुआत करने पहुंचे
गोपेश्वर। 16/17 जून को लक्ष्मण गंगा में आई जलप्रलय से पुलना गांव निवासी विजया चौहान का आवासीय भवन मलबे में दफन हो गया था। पांच माह तक अपने सात सदस्यीय परिवार के साथ होटल में दिन गुजारने के बाद अब विजया पुलना गांव लौट आई है। उसका परिवार दिनभर अपने क्षतिग्रस्त घर के मलबे को साफ कर रात को उसी मलबे में सोता है।
सरकार की और से फौरी तौर पर उन्हें दो लाख रुपये दिए गए। इसके अलावा उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं दी गई। क्षेत्र में पड़ रही इस कड़ाके की ठंड में विजया के परिवार के अलावा गांव के करीब 18 परिवार अपने क्षतिग्रस्त भवनों पर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने पहुंच गए हैं।