फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   kashmiri businessman suffer from terrorism.

कश्मीरियों की बस एक गुहार, 'जीओ और जीने दो'

Wed, 30 Dec 2015 01:54 PM IST
सुषमा पाठक/ अमर उजाला, देहरादून
सुषमा पाठक/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 30 Dec 2015 01:54 PM IST
विज्ञापन
kashmiri businessman suffer from terrorism.

जम्मू-कश्मीर में तनाव के कारण व्यवसाय और पर्यटन पर पड़ रहे कुप्रभाव से व्यापारियों का बुरा हाल है।

विज्ञापन


'बहन मेरी... अमन और मुआवजे का संदेश देने वाले ही तो कुर्सी पर बैठे हैं। लोग भी असमंजस में हैं। कभी पीडीपी कभी भाजपा को तरजीह देते हैं। यहां तो वोट भी दो और गोली भी खाओ। देश के आला हुक्मरान (सरकार) से बस यही चाहत रखते हैं, जीएं और हमें भी जीने दें। ताकि पर्यटकों की आवाजाही बढ़े तो बिजनेस में भी इजाफा हो।' ये बातें श्रीनगर से आए व्यापारी कहते हैं।

12वीं पास तनवीर परेड ग्राउंड में लगे नेशनल हैंडलूम एक्सपो में पशमीना शॉल की वैरायटी लेकर आए हैं। कहते हैं तनाव करने वाले उन मुफलिसों के बारे में भी नहीं सोचते जिनके यहां शहर में जरा सी हड़ताल या बंदी होने पर चूल्हे भी ठंडे हो जाते हैं।
विज्ञापन


बच्चे एक दिन स्कूल जाते हैं और 15 दिन छुट्टी हो जाती है। अनंतनाग से पेपर अखरोट बेचने आए जुल्फकार अहमद और जावेद कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में ज्यादातर रोजगार पर्यटकों पर निर्भर है। टूरिस्ट देशी हों या विदेशी, यहां आने में भी डरते हैं। इसके जिम्मेदार यहां के हालात हैं। अपने ही राज्य का सामान दूसरी जगह लगने वाली सेल और एक्सपो में बेचना पड़ता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


लौटने लगे हैं कश्मीरी पंडित
जम्मू कश्मीर छोड़कर दूसरे राज्यों में जाकर बसने वाले कश्मीरी पंडित अब लौटने लगे हैं। पांच वर्ष पहले की तुलना में कुछ हाल सुधरे हैं। ये दीगर है कि रोजगार के लिए उन्हें आज भी मशक्कत करनी पड़ रही है। स्टॉल 97 पर जम्मू के रूपनगर से वूडन स्टिक से बने शॉल बेचने आए राजेश कुमार भी वहां घटते व्यवसाय और भटकते व्यापारियों के लिए राज्य में हो रहे तनाव को जिम्मेदार मानते हैं।

श्रीनगर से आए अयान कहते हैं कि पढ़ने की उम्र में महीनेभर की जेल काट ली। तब उम्र 14 साल थी। कसूर क्या था, पता नहीं। शहर में दंगा हुआ और पुलिस पकड़कर ले गई। वापस आए तो स्कूल से बाहर हो गए और अब काम की तलाश में शहर-शहर जाना पड़ता है। उनकी बात से आदिल इत्तेफाक रखते हैं।

कश्मीर के सोरा से आए आशिक खुद को वहां कर्फ्यू, हड़ताल या दंगे की स्थिति में अचानक बंद हुए व्यापार के लिए मानसिक रूप से तैयार बताते हैं। कहते हैं खुदा जाने कश्मीर को कब निजात मिलेगी ऐसे माहौल से। देश और सरकार से केवल अमन-चैन चाहते हैं।

क्या फायदा पढ़-लिखकर
मुझे पीजी और बीएड करके क्या मिला। कश्मीर में नौकरियां मिलती नहीं। रोजगार करने पर सैलानियों के भरोसे जो दोगुनी कमाई हो जाती तो कश्मीर के हालात उन्हें आने से रोक देते हैं। लोगों की सुरक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं है। पचास हजार लड़के-लड़कियां हर साल यहां से ग्रेजुएशन करते हैं, पर नौकरी-रोजगार के लिए दूसरी जगह जाना पड़ता है।


प्राइवेट सेक्टर ज्यादा यहां है नहीं। विरोध करने पर गोलियां चलती हैं। दंगों में बीस हजार से ज्यादा लोग आज भी गायब है। आखिर क्या मिल रहा हम युवाओं को कश्मीर जैसी जगह पर जो पूरी तरह से पर्यटन पर निर्भर है। उसके बाद भी कश्मीरी केतली ‘समोवर’ में देहरादून आकर कहवा बेचना पड़ रहा है। कैसे कह दें कि कश्मीर के हालात का लोगों की रोजी-रोटी पर असर नहीं पड़ रहा। अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं श्रीनगर से आए मुबारक।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed