कारगिल विजय दिवस: 16 दिन तक भूखे पेट रहकर इन जांबाजों ने लड़ी थी जंग, पाक को ऐसे चटाई थी धूल
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चारों तरफ घाटियों में गोलियों और बम की आवाज गूंज रही थी। खाने का इंतजाम नहीं था तो कपूर जलाकर मैगी बनाकर काम चलाते थे। बंकर नहीं थे तो पत्थरों का सहारा लेकर पाकिस्तानी सेना का सामना करते थे।
साथियों की लाशें हाथों में देखकर खून खौल जाता था। यहीं से शुरू हुई थी पाकिस्तान को धूल चटाने की कहानी। इसी कहानी में छिपा है भारत की जीत का फलसफा। कारगिल युद्ध में 16 दिन तक बिना खाना खाए जंग लड़ने वाले 4/3 गोरखा राइफल के जांबाज हवलदार राजेश मल्ल और अरविंद सिंह थापा ने अमर उजाला से युद्ध की यादें ताजा कीं।
जैसे ही युद्ध की सूचना आई तो चंद्रबनी निवासी हवलदार राजेश मल्ल और अरविंद सिंह भी अपनी बटालियन के साथ कश्मीर पहुंच गए। मंजर खौफनाक था। सबसे पहले काले झंडे लगी गाड़ियों से सामना हुआ।
युद्ध में हथियार ही थी बीवी
समाने रखी शहीद जांबाजों की लाशें देखकर खून खौल जाता था। 1/11 गोरखा राइफल्स के साथ मिलकर कारगिल युद्ध शुरू किया। बोफोर्स सबसे बड़ा सहारा था। दिन हो या रात, केवल बम और गोलियों की आवाज कानों में गूंजती थीं। एक रात तो मौत से सीधे सामना हुआ। लोग कम थे और पाकिस्तानी फौज सामने से लगातार हमला कर रही थी। इसके बावजूद रातभर मोर्चा संभाला।
दोनों दोस्तों ने बताया कि युद्ध के वक्त उन्हें समझाया गया था कि अब देश के लिए जान की बाजी लगाने का वक्त आ गया है। आपके बीवी-बच्चों को देश संभालेगा। अब हथियार ही आपकी बीवी है। यह अंत समय तक आपका साथ देगी।
काश, हमेशा मिले वह इज्जत
हवलदार अरविंद सिंह व राजेश मल्ल का कहना है कि एक फौजी देश के लिए लड़ता है। जैसा सम्मान कारगिल के दौरान मिला, वैसा ही हमेशा मिलना चाहिए। फौजी ड्यूटी पर जाता है तो अक्सर पूरा रास्ता ट्रेन में खड़े-खड़े काट देता है।