आसान नहीं नड्डा और प्रधान के लिए चढ़ना पहाड़
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भाजपा ने उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा के चुनाव में पार्टी को किला फतह कराने की जिम्मेदारी केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा और पेट्रोलियम राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र प्रधान को प्रभारी बनाकर सौंपी है। संगठन की दृष्टि से दोनों नेताओं के पास काफी अनुभव है, लेकिन प्रदेश में पार्टी की नाव किनारे लगाने के लिए इन दोनों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। दोनों को हरदा फैक्टर का मुकाबला करने की रणनीति बनाने के साथ-साथ पार्टी में चल रही गुटबाजी से भी पार पाना होगा।
धर्मेंद्र प्रधान 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान उत्तराखंड के चुनाव प्रभारी रह चुके हैं। वह प्रदेश की राजनीति से काफी हद तक वाकिफ हैं। लेकिन इस बार स्थितियां थोड़ी भिन्न हैं। 2012 के चुनावों के वक्त प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। बीसी खंडूड़ी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद भी भाजपा 31 के आंकड़े को ही छू पाई और खंड़ूडी खुद चुनाव हार गए।
पार्टी के सामने प्रदेश में चेहरे का संकट
इस बार पार्टी विपक्ष में है। विपक्ष में होने के बाद भी बाद में गुटबाजी जोरों पर है। पार्टी तीन-चार खेमों में बंटी हुई नजर आ रही है। इस समय विजय बहुगुणा को मिलाकर पार्टी में चार-चार पूर्व मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस से बगावत करके आए नौ पूर्व विधायकों को लेकर पार्टी में ही विरोध के स्वर उठ रहे हैं। इन नौ पूर्व विधायकों को लेकर पार्टी में एक राय बनाने की कोशिश इन दोनों नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
2012 में पार्टी ने खंडूड़ी का चेहरा आगे करके चुनाव लड़ा था। इस बार प्रदेश में भाजपा का चेहरा कौन होगा, अभी तक यह पार्टी तय नहीं कर पाई है। पार्टी चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ेगी या नहीं इसको लेकर भी भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। जबकि कांग्रेस की ओर से हरीश रावत का चेहरा सामने है। लिहाजा नड्डा और प्रधान के समक्ष प्रदेश में कई चुनौतियां सामने आएंगी, जिसका मुकाबला करने के लिए दोनों को कारगर नीति बनानी पड़ेगी।
भाजपा की सोची-समझकर बनाई है रणनीति
भाजपा ने सोची समझी रणनीति के तहत जेडी नड्डा और धर्मेंद्र प्रधान के रूप में तुरुप का पत्ता उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस के समक्ष फेंका है। प्रधान को उत्तराखंड के मामले को लेकर काफी अनुभव है, जबकि नड्डा को चुनाव की कमान इसलिए दी गई है कि कठिन चुनावी समीकरणों के बीच पलड़ा अपने पक्ष में झुकाने की महारथ उनके पास है। इसके अलावा नड्डा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के विश्वासपात्रों में हैं।
18 मार्च के बाद प्रदेश की राजनीति में आए उठापटक के दौर में पार्टी ने कई प्रयोग किए। कई लोगों को पहाड़ पर कमल खिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। कैलाश विजयवर्गीय और श्याम जाजू जैसे महारथी प्रदेश में कोई जादू नहीं दिखा पाए। फ्लोर टेस्ट से लेकर राज्यसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति विफल रही। देश की राजनीतिक बिसात पर हर बाजी को जीतने में हरीश रावत सफल रहे। इसको लेकर भाजपा की किरकिरी भी हुई।