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Joshimath: सरकार के लिए ये दौड़ने का वक्त है...कदम ताल का नहीं, पढ़ें इंद्रेश मैखुरी का यह खास इंटरव्यू

Tue, 24 Jan 2023 01:26 PM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 24 Jan 2023 01:26 PM IST
सार

जोशीमठ को बचाने के लिए इस आंदोलन से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी भी जुड़े हैं। उनका कहना है कि जो दौड़ने का समय है, उस समय सरकार कदमताल करती नजर आ रही है। 

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Joshimath Is Sinking India Communist Party Garhwal Secretary Indresh Makhuri special interview
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जोशीमठ को भू-धंसाव के महासंकट से उबारने के लिए केंद्र से लेकर राज्य तक का सरकारी तंत्र हाथ-पांव मार रहा है। लेकिन पुनर्वास, विस्थापन की पहेली हल नहीं हो पा रही है। आपदा ने एक समृद्ध शहर को अवसाद में घेर लिया है। लोगों का धैर्य टूट रहा है, अब वे सड़कों पर उतरकर आंदोलन पर आमादा है। जोशीमठ को बचाने के लिए इस आंदोलन से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी भी जुड़े हैं। उनका कहना है कि जो दौड़ने का समय है, उस समय सरकार कदमताल करती नजर आ रही है।

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चीन की कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में विकास विरोधी होने के आरोप को मैखुरी सिरे से खारिज करते हैं। वह एनटीपीसी की जलविद्युत परियोजना को जोशीमठ के संकट की दीर्घकालिक वजह करार देते हैं। ऐसे ही कई सवालों पर अमर उजाला ने मैखुरी से सवाल किए। पेश है राकेश खंड़ूडी से साक्षात्कार के मुख्य अंश:-
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प्रश्न: जोशीमठ भू-धंसाव से जुड़े पूरे प्रकरण को आप कैसे देखते हैं?
इसके दो पहलू हैं। पहला तात्कालिक व दूसरा दीर्घाकलिक। तात्कालिक स्थिति यह है कि 14 महीने से लोग इस मसले पर बात कर रहे थे लेकिन सुनवाई नहीं हुई। सरकार इसे गंभीरता से नहीं लिया।
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प्रश्न: लेकिन जैसे दरारें बढ़ी वैसे ही सरकार हरकत में आ गई। आज आठ एजेंसियां पूरे मामले की जांच कर रही हैं? पुनर्वास का प्रयास हो रहा है?
जरूर लेकिन यह सब काम पहले शुरू हो जाना चाहिए था।

प्रश्न: खतरे के पीछे वैज्ञानिक आधार क्या लग रहा था आपको?
दरअसल, अगस्त के आसपास स्वतंत्र भूगर्भ वैज्ञानिकों ने जोशीमठ का सर्वे किया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में खतरे का इशारा किया।

प्रश्न: सरकार ने भी तो जांच कमेटी भेजी थी?
28 जुलाई 2022 को प्रदेश सरकार ने कमेटी बनाकर उसे जोशीमठ भेजा। उस कमेटी ने सितंबर 22 में अपनी रिपोर्ट दी। उस कमेटी ने वहां के हालात को लोगों पर डाल दिया, जिन पर हमारी असहमति है। लेकिन खतरे को कमेटी ने भी चिन्हित किया था।

प्रश्न: रिपोर्ट में किन बातों पर आपकी सहमति है?
दो बातें हैं। कमेटी ने कहा, जितने भी निर्माण कार्य हो रहे हैं, उन पर तत्काल रोक लगाई जाए। दूसरा जो घर खतरे की जद में हों, उन्हें तत्काल चिन्हित करना चाहिए। सरकार ने अपनी बनाई कमेटी की रिपोर्ट पर सुनवाई नहीं की?

प्रश्न: इसकी वजह क्या थी, आपको क्यों लगता है कि सुनवाई नहीं की?
विस्थापन और पुनर्वास को लेकर रफ्तार धीमी है। इसके लिए अब तक की सभी सरकारों की धीमी गति को जिम्मेदार मानता हूं। राज्य में अभी भी सैकड़ों गांव विस्थापन के लिए चिन्हित हैं। पूरा तंत्र इसे गंभीरता से नहीं लेता। उसे लगता है कि ये सब समय के साथ थम (सेटल) हो जाएगा। तंत्र का प्रतिक्रिया करने का यही तरीका है। 26 अगस्त 2022 को सचिव आपदा प्रबंधन से भी मिले थे। उस दिन भी चिट्ठी उन्हें दी थी।

प्रश्न: दीर्घकालिक कारण किसे मानते हैं?
दीर्घकालिक का कारण हम एनटीपीसी की जल विद्युत परियोजना को मानते हैं। सुरंग निर्माण की प्रक्रिया में 2009 में टनल बोरिंग मशीन फंसी। 2012 में वहां से पानी निकलने लगा। फिर विस्फोटकों के इस्तेमाल से तपोवन की ओर से टनल बनाना शुरू किया। 1976 की मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि यहां भारी निर्माण नहीं होना चाहिए। लेकिन यह तो बहुत भारी निर्माण है

प्रश्न: लेकिन एनटीपीसी का तो साफ कहना है कि वे टनल को डेढ़ किमी दूर बाहर से ले जा रहे हैं, उसका कोई असर यहां नहीं पड़ रहा है?
जो चोरी करेगा या गलती करेगा, वो खुद तो नहीं कबूल करेगा। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि यह एक ही लैंड मास है। इस पर किसी भी तरह की भूगर्भीय हलचल होगी तो वह समूचे भूभाग को प्रभावित करेगी। जो तर्क वे दे रहे हैं, उस हिसाब से टनल जोशीमठ के सिर के ऊपर ही है। लेकिन टीबीएम तक जाने के लिए जो बाइपास टनल उन्होंने बनाई है, वह जोशीमठ के नीचे से गुजरती है। इसे बनाने के लिए भी उन्होंने विस्फोटकों का इस्तेमाल किया
है।

प्रश्न: आप कह रहे हैं केन्द्र सरकार एनटीपीसी का बचाव में उतरी है?
हमें यह कहा जा रहा है कि जोशीमठ में वैज्ञानिकों की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हम कुछ बोलें। लेकिन अपनी तरफ से सब बचाव कर रहे हैं। पूरे विकास के मॉडल पर ही सवाल है। ये विनाशकारी विकास का मॉडल है।

प्रश्न: लेकिन पहाड़ के लोगों को विकास की भी जरूरत है, बिजली, सड़क की अनदेखी नहीं कर सकते हैं?
क्या ये सारी बिजली पहाड़ के लोगों को मिलनी है। बिजली बनाने की पूरी प्रक्रिया में 2003 में जो ऊर्जा नीति बनी, उसमें यह प्रावधान है कि बिजली बनाने वाली कंपनी स्वतंत्र ऊर्जा निर्माता है। वह किसी को भी बिजली बेच सकता है। 88 प्रतिशत बिजली किसी को भी बेच सकता है।

प्रश्न: बिजली ही नहीं प्रोजेक्ट से लोगों को रोजगार भी मिलता है।
रोजगार बहुत अस्थायी और असुरक्षित किस्म के हैं। इसके एवज में पूरा इलाका पर्यावरण व पारिस्थितिकी की जितनी कीमत चुकाता है,उसकी तुलना में यह बहुत ही नगण्य है। एनटीपीसी परियोजना में 2011 में बिजली उत्पादन हो जाना था। लेकिन यह 2023 है और अभी तक इस परियोजना के बनने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। ये केवल विनाश और आपदा का ही निर्माण कर रहे हैं। इसके अलावा यहां किसी चीज का उत्पादन यहां नहीं हो रहा है।

प्रश्न: कहा जाता है-विकास चाहिए तो कुछ तो कीमत चुकानी पड़ती है?
बिल्कुल यह कहा जाता है कि विकास के लिए कुछ विनाश तो झेलना पड़ता ही है। बिजली चाहिए, सड़क चाहिए लेकिन उसकी कीमत कौन चुकाएगा? लेकिन विका जिनका होता है और विनाश जो झेलते हैं, वे अलग-अलग लोग हैं।

प्रश्न: तो फिर हम कैसी परियोजनाएं अपनाएं?
हम ऐसी परियोजनाएं क्यों नहीं खोजते जो पर्यावरण व प्रकृति के साथ तालमेल बैठाए। प्रकृति विरोधी ऐसा कुछ न करें, जिसकी वजह से वे लोग मारे जाएं, जो उत्तरदायी न हों।

प्रश्न: आप एनटीपीसी को जिम्मेदार बता रहे हैं, लेकिन आपने वहां बन गए बड़े-बड़े होटलों व भवनों का विरोध नहीं किया?
इसके लिए नियमन के सभी तौर तरीके हैं। एसडीएम, नगर पालिका, नगर नियोजन है।नियमन करना इनका काम था, लेकिन इन्होंने नहीं किया या नहीं होने दिया। ये कहिए कि नियमन की प्रक्रिया असल में मुट्ठी गर्म करने की प्रक्रिया है। पैसा खर्च करके कितना भी बड़ा ढांचा खड़ा कर सकते हैं। वे आंखें बंद कर बैठे रहते हैं।

प्रश्न: लेकिन आप लोग निर्माण बंद कर रहे थे, क्या उसमें ये भी शामिल है?
किसी भी किस्म का जो भारी निर्माण है। हम 2013 की आपदा के बाद से ये बात कह रहे हैं। पहाड़ में हमें कैसा घर बनाना है, यह भी सोचना पड़ेगा। ये कंक्रीट और सीमेंट वाले मॉडल को झेल सकने की हमारी जमीन की क्षमता नहीं है। सरकारी निर्माण भी वैसा ही है।

प्रश्न: लेकिन आईटीबीपी ने हल्के भवन बनाए हैं?
हो सकता है वहां कुछ हो। लेकिन आम तौर पर आप देखेंगे, जो भवन लोनिवि व सरकार बनाती है, वे ऐसे नहीं हैं। 2013 की आपदा में हमने देखा। नियमन होना चाहिए। कैसा भवन बनाएंगे, कितना सरकारी भवन से लेकर निजी भवनों तक के बारे में गंभीरता से सोचना होगा।

प्रश्न: प्रदेश में और कितने जोशीमठ हैं, आपकी निगाह में?
धारचूला, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, उत्तरकाशी के कुछ इलाकों में ऐसे खतरे हैं। भारी निर्माण और अनियोजित शहरीकरण तो पूरे उत्तराखंड में ही एक तरह से दिखाई दे रहा है। जो जानलेवा हो सकता है। 2013 के बाद हर बार एक नया खतरा आता है, और कुछ दिन बाद हालात सामान्य हो जाता है उसी तंत्र भी और लोग भी उसी गति में आ जाते हैं। खतरा इसम समय है।

प्रश्न: आप हेलंग बाइपास का आपका विरोध है। वह कैसे नुकसान पहुंचा रहा है, जोशीमठ को?
हेलंग बाइपास जोशीमठ के नीचे से बनाया जा रहा है। उसे बनाने की प्रक्रिया में विस्फोटकों का इस्तेमाल हो रहा है। अभी यह कमजोर पहाड़ हो गया है। जिस समय आदमी स्वस्थ होता है, तो उस समय उसे खींचकर मुक्का मारिए, वह बर्दाश्त कर लेता है। लेकिन जब वह बीमार होता है तो उसके सामने जरा जोर से भी बोलिए तो उसे परेशानी होती है। वही स्थिति इस शहर की है। यह रुग्ण अवस्था से गुजर रहा है। किसी भी तरह की छेड़छाड़ या भारी निर्माण घातक हो सकता है।

प्रश्न: सरकार सबसे पहले क्या करे?
लोगों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण का इंतजाम तत्काल होना चाहिए। इतने दिन बीतने के बाद भी कोई योजना नहीं है।

प्रश्न: सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही है?
जी नहीं, जिस समय दौड़ने का समय है, उस समय सरकार कदमताल कर रही है। लोगों के भवन आप तोड़ रहे हैं, लेकिन अभी यह तय नहीं हुआ कि उसका मुआवजा क्या होगा? ये भी संकट है कि लोग कितने दिनों तक राहत शिविरों में रहेंगे। अवसाद की स्थिति में लोग जा रहे हैं। इसमें तेजी होनी चाहिए। हम लोग पिछले दिनों डीएम से मिले। हमने उनको राष्ट्रीय आपदा एवं पुनर्वास नीति 2007 के बारे में पूछा, लेकिन उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं नहीं थी। हमसे कहा कि आप ले आइये हम उसे ही लागू कर देंगे। इस स्तर पर तंत्र है।

प्रश्न: जोशीमठ में पुनर्निर्माण की स्थिति दिखती नहीं है? उसे खाली करने और कहीं और जगह जाकर बसने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखता। आपका क्या मानना है?
जोशीमठ का अस्तित्व रहेगा या नहीं, यह आज सबसे बड़ा सवाल है। हमारी भू-वैज्ञानिकों से बात हुई। उनका कहना है कि पूरा एक साथ नीचे नहीं जाएगा, बल्कि धीरे-धीरे नीचे खिसकेगा। लेकिन लोगों को जो नुकसान होना है, वह तो हो ही जाएगा। यही सबसे बड़ी चुनौती है कि लोगों कैसे सुरक्षित हटाकर नई प्रक्रिया शुरू करें। दूसरा, देश या दुनिया में इस तरह के घटनाक्रम हुए तो वहां स्टेबलाइजेशन की तकनीक या विज्ञान मौजूद है तो यह रास्ता भी तलाशा जाना चाहिए।

प्रश्न: ये आरोप है कि आप लोग कम्युनिस्ट हैं। पूरा इलाका चीन सीमा से सटा है। चीन के दबाव में इस तरह का विरोध करते हैं, ऐसे मुद्दे उठाते हैं?
अगर हम ही अकेले होते तो आठ-10 लोगों का हटाना तो क्या कठिन है? लेकिन यह पूरे जोशीमठ की आवाज है। इसलिए लोग बर्फ में भी धरने पर आ
रहे हैं। वो कोई हमारी पार्टी के लोग नहीं है। हमारी दिलचस्पी यही है कि यह इलाका सुरक्षित रहे। यहां की इकोलॉजी और पर्यावरण बचा रहे, तभी सीमा भी बची रहेगी। पूरा इलाका तबाही का शिकार होगा, तो सीमा मजबूत होगी या कमजोर होगी। देश मजबूत होगा या कमजोर होगा। वो लोग हितैषी हैं या हम लोग जो इलाके को तबाही बचाना चाहते हैं।

प्रश्न: जहां तक चीन के प्रति सहानुभूति की बातें हैं, उस पर क्या कहेंगे?
चीन को लेकर हमारी और हमारी पार्टी की ढेर सारी चीजों में आलोचना रही है। आज भी हम यह मानते हैं कि चीन कोई वैसा समाजवादी मुल्क नहीं है। उसके विकास के मॉडल को लेकर हमारी आलोचना है। मजदूरों के साथ उसके तौर तरीकों को लेकर भी आलोचना है। सबसे ज्यादा बार भाजपा का प्रतिनिधिमंडल चीन गया। उसका अंतर्संबंध बढ़ा है। हमारा तो नहीं है। हमने तो देखा नहीं चीन कहां है?

प्रश्न: कल ऐसी स्थिति बनती है कि नया जोशीमठ बसाने की बात होती है, तो सबसे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है?
यहां लोगों ने दो-तीन जगह बताई हैं। यहां लोगों की आम राय यह है कि जोशीमठ के आसपास ही बसना चाहते हैं। यह शहर सिर्फ शहर नहीं बल्कि समृद्धि का स्रोत है। इसके आसपास ही सुरक्षित जगहों लोगों बसाया जाए ये आम लोगों की राय है।

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