उत्तराखंडः जापान की तकनीक से जंगल की ‘तस्वीर’ बदलने की योजना
प्रदेश में जापान की मियावाकी तकनीक से जंगलों की तस्वीर बदलने की योजना है। वन विभाग इस तकनीक से मैदान (तराई केंद्रीय वन प्रभाग के पीपलपड़ाव रेंज) और पहाड़ (रानीखेत) में जंगल तैयार करने का प्रयास कर रहा है। वनाधिकारियों का दावा है कि इसके शुरुआती परिणाम आशा से बेहतर आए हैं।
वन विभाग जंगल को तैयार करने में बीज बुआन विधि और पौधे लगाने का काम करता है। इसमें पौधे एक निश्चित दूरी पर लगाए जाते हैं। अब वन विभाग ने जंगल की दशा सुधारने के लिए जापान की मियावाकी तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया है।
वन संरक्षक अनुसंधान संजीव चतुर्वेदी के अनुसार इसके तहत 2018 में तराई केंद्रीय वन प्रभाग के अंतर्गत पीपलपड़ाव (.25 हेक्टेयर) और रानीखेत (.25 हेक्टेयर) में पौधों को तैयार करने का काम शुरू किया गया। इसमें पहले मिट्टी की सेहत सुधारी गई, उसके बाद 40 प्रजातियों और सहचरी प्रजातियों को करीब लगाया गया। एक साल के में पौधों की ग्रोथ तुलनात्मक तौर कई गुना अच्छी हुई है। प्रयोग अगर सफल रहा तो उसे दूसरी जगह पर भी शुरू किया जाएगा। इस तकनीक से तेजी के साथ मिश्रित वनों का जंगल तैयार किया जा सकता है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने बड़े पैमाने पर मियावाकी तकनीक से जंगल तैयार करने का काम शुरू भी कर दिया है।
पहले दिया गया प्रशिक्षण
मियावाकी तकनीक की शुरुआत करने से पहले वन कर्मियों को बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें तकनीक के बारे में जानकारी देने के साथ फील्ड विजिट कराया गया। इसके बाद उत्तराखंड में प्रयोग शुरू हुआ है।
क्या है मियावाकी तकनीक
वन क्षेत्राधिकारी मदन बिष्ट बताते हैं कि जापान में अकीरा मियावाकी ने अस्सी के दशक में इसकी शुरुआत की थी। इसमें तीन स्तर पर काम होता है। पहले स्थानीय प्रजातियों की पहचान और फिर नर्सरी में पौधों को तैयार करना, मिट्टी की सेहत सुधारने के बाद एक खास पदार्थ में डुबो कर शर्ब (झाड़ी प्रजाति), हर्ब (शाकीय) और पेड़ तीनों प्रजातियों के पौधों को समूह में लगाया जाता है।
ये पौधे बहुत करीब लगते हैं। इस प्रयोग से जंगल तेजी से तैयार हुआ। बाद में इसे अन्य जगहों पर भी अपनाया। गया। इसी तकनीक से पीपलपड़ाव में पौधों का रोपण किया गया। इन पौधों की ग्रोथ सामान्य तौर पर तैयार होने वाले पौधों की तुलना में दो गुना ज्यादा है।