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हिमालयी क्षेत्रों में खत्म हो रहे कीटभक्षी पौधे, जैव विविधता पर पड़ रहा असर
Mon, 02 Sep 2019 02:37 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Mon, 02 Sep 2019 02:37 PM IST
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फाइल फोटो
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ड्रोसेरा पेल्टाटा, पिंगुुईकुला अल्पाइन और अल्ट्रीक्यूलेरिया जैसी कीटपक्षी पौधों की प्रजातियां तेजी से खत्म हो रही हैं। अब इनके संरक्षण के लिए वन विभाग के वैज्ञानिकों की टीम उत्तराखंड के गोपेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, गैरसैंण आदि क्षेत्रों में अध्ययन कर रही है।
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वन संरक्षक एवं वन अनुसंधान शाखा के निदेशक संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक देश के हिमालयी क्षेत्रों में कीटभक्षी पौधों की 40 प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। इनमें से तीन प्रजातियां (ड्रोसेरा पेल्टाटा, पिंगुुईकुला अल्पाइन और अल्ट्रीक्यूलेरिया) उत्तराखंड में पाई जाती हैं। तीनों प्रजातियों में एंटी वैक्टीरियल एवं एंटीफंगल गुण पाए जाते हैं।
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इन प्रजातियों द्वारा पेड़ों को नुकसान पहुंचाए जाने वाले कीटों को खाया जाता है। इससे जैव विविधता पर असर नहीं पड़ता। लेकिन, हिमालयी क्षेत्रों में 3500 से लेकर 4500 फीट पर पाई जाने वाली इन प्रजातियों के पौधों के तेजी से समाप्त होने से समस्या खड़ी हो रही है। अब इनके संरक्षण के लिए योजना तैयार की है। इसके तहत मिट्टी में आए बदलाव और मौसम का इन पौधों पर पड़ रहे असर का अध्ययन किया जा रहा है।
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बदरीनाथ, ऋषिगंगा वैली, नंदा देवी नेशनल पार्क में पिंगुईकुला अल्पाइन
पिंगुईकुला अल्पाइन प्रजाति का कीटभक्षी मिलम क्षेत्र के मार्तोली, रालम वैली के अपर पिलथी क्षेत्र, बदरीनाथ, ऋषिगंगा वैली, नंदा देवी नेशनल पार्क और पातालखंड क्षेत्र में पाया जाता है। जबकि यूट्रीकुलारिया प्रजाति का कीटभक्षी चमोली जिले में 3300 मीटर की ऊंचाई पर रुद्रनाथ अल्पाइन जोन में पाया जाता है। ड्रोसेरा पेल्टाटा प्रजाति का पौधा 3700 मीटर की ऊंचाई पर गोपेश्वर मंडल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ थाल केदार क्षेत्र में पाया जाता है।