भारत, चीन और नेपाल को करीब लाया पवित्र कैलाश
कैलास-मानसरोवर पवित्र भू परिक्षेत्र ने भारत, चीन और नेपाल की नजदीकियां और बढ़ा दी हैं। खासतौर पर दिलों की खाई अधिक पटी है। कैलाश पवित्र भू क्षेत्र परियोजना की वजह से तीनों देशों के विशेषज्ञ एक-दूसरे के करीब आए और खासियतों को साझा किया है।
इस साल परियोजना का पहला चरण पूरा हो रहा है। अगले साल से दूसरा चरण शुरू होगा। इसमें तीनों देशों की सरकारी एजेंसियों और संस्थाओं के प्रतिनिधि परियोजना की कार्ययोजना के संबंध में योगदान देंगे।
कैलाश पवित्र भू-क्षेत्र परियोजना का पहला चरण तीन साल का रहा है। पहले चरण की उपलब्धियों की समीक्षा और दूसरे चरण की कार्ययोजना बनाने के संबंध में शनिवार को परियोजना में सहयोग कर रही सभी संस्थाओं की रामनगर के नया गांव में बैठक हुई।
साझा सांस्कृति और प्राकृतिक विरासत है कैलास
यह बैठक नेपाल आधारित अंतरराष्ट्रीय संस्था ईसी मोड की अगुवाई में हुई। इसमें कहा गया कि कैलाश-मानसरोवर भू-परिक्षेत्र भारत, चीन और नेपाल की साझा सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत है।
कैलाश परियोजना के पहले चरण में जो सबसे बड़ी उपलब्धि रही वो यह है कि तीनों देशों के प्रतिनिधि एक-दूसरे की सामाजिकता, संस्कृति, पर्यावरण के मुद्दों के प्रति जागरूक हुए और इन्हें साझा किया।
पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्ययोजनाएं तैयार कीं। लोगों की सोच में बदलाव आया। जब आपस में एक-दूसरे को जाना तो अलगाव और द्वेष की भावना कम हो गई। परियोजना का अगला चरण पांच साल का होगा। इसमें प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासतों को सहेजने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण संबंधी विभिन्न प्रोजेक्ट तैयार किए जाने हैं।
तीनों देशों के प्रतिनिधि लेंगे हिस्सा
संस्थाओं के साथ ही तीनों देशों की सरकारों के प्रतिनिधि इस साझा कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे, जिससे सरकार स्तर पर योजनाएं चालू हों और परियोजना को सहयोग मिले।
पहले चरण में हमने कई महत्वपूर्ण माइल स्टोन तय कर लिए हैं। खास यह है कि एक-दूसरे के प्रति अलगाव की भावना कम हुई है। परियोजना से तीनों देशों के लोग जुड़े हैं, जो भू-परिक्षेत्र की बेहतरी के लिए साझा प्रयास करेंगे। तीन साल का चरण खत्म हुआ, अब अगले पांच साल के लिए योजनाएं तैयार करेंगे।
- डॉ. राजन कोत्रू, संयोजक अंतरराष्ट्रीय संस्था ईसी मोड