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स्वतंत्रता दिवस 2019: फांसी का नाम सुनकर बढ़ गया था 24 साल के इस जांबाज का वजन

Thu, 15 Aug 2019 09:12 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 15 Aug 2019 09:12 AM IST
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independence day 2019 freedom fighter shaheed veer keshari chand story
वीर शहीद केसरी चंद - फोटो : फाइल फोटो

देवभूमि उत्तराखंड के इस बेटे ने देश सेवा के लिए अपनी जान गंवाने से भी गुरेज नहीं किया। इस वीर सपूत का नाम शहीद वीर केशरी चंद था। 3 मई 1945 को वीर केशरी चंद को हंसते हुए फांसी दी गई थी। उस समय उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष थी। कहा जाता है कि जेल में रहने पर उनका वजन ढाई किलो बढ़ गया था।

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शहीद केशरी चंद की याद में देहरादून के चकराता में रामताल गार्डन में हर साल 03 मई को मेले का आयोजन किया जाता है। केशरी का जन्म 1 नवंबर 1920 को उत्तराखंड के देहरादून जिले के जनजातिय क्षेत्र जौनसार बावर के ग्राम क्यावा में पंडित शिव दत्त के घर हुआ। केशरी के पिता चाहते थे कि वह पढ़ लिखकर एक बहुत बड़ा अधिकारी बन उनका नाम रोशन करें।

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रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कोर में सूबेदार के पद पर भर्ती हुए

लेकिन केशरी फौज में जाकर देश के लिए कुछ करना चाहते थे। लाख समझाने के बावजूद भी केशरी 10 अप्रैल 1941 को वह रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कोर में सूबेदार के पद पर भर्ती हो गए। इसी साल केशरी ने वॉयसरॉय कमीशन ऑफिसर का कोर्स पूरा किया।

दूसरे विश्व युद्ध में उन्हें मलाया भेजा गया। इस दौरान 15 फरवरी 1942 को जापानी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद वो सुभाष चंद्र बोस के संपर्क में आए और उनसे प्रभावित होकर भारत की आजादी का सपना साकार करने के मकसद से आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। 

हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने की धाराओं में मुकदमा चला

उनकी बहादुरी को देखते हुए उन्हें इंफाल में एक पुल उड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। इस पुल से ब्रिटिश सेना का सामान आता था, लेकिन ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़ लिया। उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया। केशरी पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने की धाराओं में मुकदमा चला। केशरी ने पूरी बहादुरी के साथ केस का सामना किया। कोर्ट परिसर में भी वह भारत की आजादी के नारों को बुलंद करते रहे।

3 फरवरी 1945 को केशरी को फांसी देने का एलान ब्रिटिश जज ने किया। फांसी का वक्त सुबह छह बजे रख गया। इससे पहले पांच बजे एक घंटे के लिए केशरी को परिवारजनों से मुलाकात का वक्त दिया गया। जैसे ही केशरी के पिताजी और परिजन उनसे मिलने पहुंचे वह रोने लगे। 

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'मेरे मृत शरीर पर कोई भी विदेशी कपड़ा न रखा जाए'

उन्हें रोता देख केशरी ने हंसते हुए कहा आप लोग क्यों रोते हैं। आपको तो खुश होना चाहिए कि अपका बेटा देश को आजादी दिलाने के लिए काम आ रहा है। रोइए मत, मुझे हंस कर विदा कीजिए। मेरी शहादत में आसुओं का कोई काम नहीं है।

अंतिम वक्त में जब उनसे पूछा गया कि उनकी आखिर ख्वाहिश क्या है तो उन्होंने कहा मैं भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से आजाद देखना चाहता हूं। और मेरे मृत शरीर पर कोई भी विदेशी कपड़ा न रखा जाए। मेरे शरीर को खादी में लपेटा जाए।

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