नोटों के लिए नेताजी ऐसे बसाते हैं अवैध बस्ती
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देहरादून के दीपनगर में सोमवार को नगर निगम ने जिस बस्ती को अपनी जमीन पर बसा बताकर ढहा दिया अमर उजाला की टीम ने बुधवार को उसका दौरा किया तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
मालूम चला कि बस्ती के हर घर में ऊर्जा निगम ने मीटर लगा रखे थे और जल संस्थान की तरफ से पेयजल लाइन पहुंचाई गई थी।
लोगों ने बिजली और पानी के बिल की प्रतियां दिखाकर सवाल किया कि यदि बस्ती अवैध थी तो बिजली-पानी के कनेक्शन क्यों दिए गए? यही नहीं स्थानीय पार्षद पर पैसे लेकर कब्जा कराने का आरोप भी लोगों ने दोहराया।
पूरी बस्ती अवैध, लेकिन बिजली का मीटर और पानी का कनेक्शन वैध। आरोप है कि पैसा लेकर स्थानीय पार्षद ने बस्ती वालों को नगर निगम की जमीन पर बसा दिया। लेकिन अवैध बस्ती में बिजली-पानी का वैध कनेक्शन कहां से आ गया?
जाहिर है कि नेताओं के साथ ही महकमे भी अवैध कब्जा को पुख्ता कर रहे हैं। बड़ा सवाल तो नगर निगम पर है कि कई सालों बाद उसे अचानक याद आता है कि उसकी जमीन पर बस्ती बस गई है।
20-20 हजार रुपए देकर खरीदी जमीन
मंगलवार को जेब्रा टीम के साथ पहुंचे मुख्य नगर अधिकारी (एमएनए) हरक सिंह रावत से बस्ती वालों ने कागज दिखाकर खुलासा किया था कि उन्होंने जमीन पर कब्जा नहीं किया, बल्कि 20-20 हजार रुपए देकर खरीदी है।
बुधवार को जब अमर उजाला की टीम पहुंची तो पैसा लेकर जमीन देने की बात फिर सामने आई। ज्यादातर लोगों ने नगर निगम के वार्ड संख्या-32 के पार्षद सुशील पर पैसा लेकर उन्हें बसाने का आरोप लगाया।
कुछ ने क्षेत्रीय विधायक को भी निशाने पर लिया, हालांकि नाम नहीं बताया। बेघर हुए लोगों की पीड़ा यह है कि जिन नेताओं को हजारों रुपए देकर उन्होंने छत पाई थी, जब जेसीबी चल रही थी तो कोई शक्ल दिखाने नहीं पहुंचा।
यह लोग उस लेटर हेड की कापी लहराकर छत के लिए गुहार लगा रहे थे, जिसमें क्षेत्रीय पार्षद ने अवैध कब्जों को निजी भवन बता सर्टिफिकेट जारी कर दिया है।
अवैध कब्जों का मौखिक सौदा
विक्रम सिंह पूर्व सैनिक हैं। मूलरूप से चमोली के रहने वाले विक्रम ने तकरीबन पांच साल पहले वर्ष 2009 में स्थानीय पार्षद को कुछ हजार रुपए देकर उनसे नदी किनारे की जमीन का मौखिक सौदा तो कर लिया, लेकिन अब कब्जे पर जेसीबी चल जाने के बाद उसे कोस रहे हैं। वह क्षेत्रीय विधायक तक भेंट पहुंचाए जाने का आरोप लगाते हैं।
मुफ्त के चक्कर में मारे गए
दलीप सिंह कहने को शिवलोक कॉलोनी में किराए के मकान में रहते हैं, लेकिन मुफ्त में जमीन कब्जाने के चक्कर में नदी किनारे झुग्गी डाल घर बसाए थे। उन्होंने भी जमीन पर कब्जे के लिए हजारों रुपए की मांग किए जाने का आरोप लगाया। पेशे से ड्राइवर राजेंद्र ने भी कुछ ऐसी ही कहानी सुनाई।
किराया बचाने को अवैध रिहायश
दुर्गा सती भी नदी कि नारे निगम की जमीन पर बीते पांच साल से परिवार के साथ रह रही थीं। उनके पति केबल का काम करते हैं। बकौल दुर्गा पार्षद ने बेखौफ होकर उनसे वहां रहने के लिए कहा था, लेकिन जब आशियाना ढहाने की कार्रवाई हुई तो वह नहीं दिखा।
अवैध कब्जे पर सिफारिश को बोले-मानवीय भूल
हजारों रुपए लेकर लोगों को अवैध रूप से नदी किनारे बसाने का जिस पार्षद पर आरोप है, उसकी मानें तो हर जगह कब्जा है। जल संयोजन के लिए अवैध कब्जे पर सिफारिश को हालांकि वह मानवीय भूल बताते हैं।
बकौल सुशील कुछ लोग मुझे बदनाम करने के लिए रुपए लेने का आरोप लगा रहे हैं। मैं पहले भी इस संबंध में शिकायत कर चुका हूं। पानी के लिए बिल के लिए संस्तुति को मैं अपनी भूल मानता हूं।
विक्रम की बात कहूं तो वह इस जमीन पर 10 साल से रह रहे हैं। बेशक अवैध है, लेकिन वह बेहद परेशान थे। मेरे पास संस्तुति के लिए आए तो मैंने लेटर पैड पर लिखकर दे दिया।