उत्तराखंड में आज से शुरू होगी रंगों की धूम, यहां सालों से चली आ रही होली की ये अनोखी परंपरा
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वर्षों से चली आ रही पिथौरागढ़ के पुरानी बाजार की खड़ी होली सामाजिक सौहार्द की मिसाल बनी है। इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग भाईचारे के साथ रात को खड़ी होली का गायन करते हैं।
आज अष्टमी पर विधि-विधान से मां महाकाली की पूजा-अर्चना के साथ चीर आरोहण होगा और रात को खड़ी होली की धूम मचेगी। पुरानी बाजार में साह, माहरा, थापा, मालदार और खत्री परिवारों ने वर्षों पूर्व मथुरा से चीर लाकर होली गायन शुरू किया। इसमें मुस्लिम समुदाय के मीर और तुफैल शेख परिवार का भी खासा योगदान रहता था।
चीर आरोहण के साथ मां महाकाली की पूजा
पुरानी बाजार के शैलेंद्र साह ने बताया कि चीर आरोहण के साथ मां महाकाली की पूजा की जाती है। कुमाऊं में पुरानी बाजार, महाकाली दरबार गंगोलीहाट और द्वाराहाट में अष्टमी पर चीर आरोहण कर होली शुरू हो जाती है। अन्य जगहों पर एकादशी का रंग पड़ने के साथ होली गायन शुरू होता है और खड़ी होली की धूम मचती है।
पहले दिन 'कैले बांधी हो चीर रघुनंदन राजा' और मां महाकाली से संबंधित होली गायन किया जाता है। पुरानी बाजार में चीर आरोहण के बाद शिवालय के पुजारी ललित मोहन पुनेठा मंदिर के साथ ही पितरोटा स्थित कालसिन मंदिर, मां उल्का देवी, घंटाकरण मंदिर में मां महाकाली की पूजा करते हैं।
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
रात में श्रृंगार और वीर रस से संबंधित होलियों का गायन होता है। इस होली को सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी माना जाता है। हिंदू और मुस्लिम परिवार रात में गाजे-बाजे के साथ होली के गीतों में मस्त हो जाते हैं।
रात को कभी आलू तो कभी सूजी होल्यारों (होली गायन करने वालों का समूह) को खिलाई जाती है। आज गाजे-बाजे के साथ लिंठ्यूड़ा से मेल का पेड़ चीर के रूप में लाया जाएगा। इसमें पुरानी बाजार में रहने वाले लोग सामूहिक रूप से रंग-बिरंगे कपड़ों की चीर बांध परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।