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पढ़िए, बंद होने जा रही HMT की पूरी कहानी

Thu, 18 Sep 2014 12:26 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, हल्द्वानी
ब्यूरो / अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Thu, 18 Sep 2014 12:26 PM IST
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HMT company at rani bagh

अब एचएमटी बंद होने की खबर फैलते ही शोरूम में खरीददार पहुंचने लगे हैं। शोरूम में 350 से लेकर सात हजार रुपए तक की घड़ियां हैं। सूट में घड़ी रखना कभी फैशन होता था। गांधी घड़ी (पाकेट वॉच) को लोग सूट की जेब में रखकर उसकी चेन बाहर लटकाते थे। एचएमटी ही एकमात्र गांधी घड़ी बनाती थी।

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गांधी घड़ी (मेकेनिकल) 1450 और (क्वार्ट्ज) 900 सौ रुपए की है। तब रानीबाग में सालाना पांच सौ गांधी घड़ी बनती थी, जिनमें दो सौ मेकेनिकल और तीन सौ क्वार्ट्ज शामिल थी। फैक्ट्री कर्मियों के मुताबिक गांधी घड़ी का क्रेज पुराने लोगों में ज्यादा था।
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सोने का बिस्कुट लगी घड़ी भी बनी थी

रानीबाग इकाई में 1995 से 2000 तक जी-10 के नाम से सोने का बिस्कुट लगी घड़ी भी बनाई गई। इसकी कीमत लगभग 11 हजार रुपए थी। घड़ी की खासियत ही यह थी कि सुई के नीचे छोटा सा सोने का बिस्कुट लगा होता था। एचएमटी कर्मी सुनील डोभाल ने बताया कि सारी घड़ियां हाथों-हाथ बिकी थीं।
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आर्मी से मिलता था छह लाख घड़ी का ऑर्डर

HMT company at rani bagh

एचएमटी की घड़ियों के लिए आर्मी कैंटीन में भी लोगों को इंतजार करना पड़ता था। पूरे देश में लगभग छह लाख घड़ियों का ऑर्डर सालाना एचएमटी वॉच ग्रुप को मिलता था। आर्मी कैंटीन को घड़ियों की सप्लाई करने में लगभग एक माह का समय लग जाता था। आर्मी कैंटीन में घड़ी के आने की बेताबी से प्रतीक्षा की जाती थी।

1995 के बाद शुरू हुआ डाउन फॉल

1993 में टाइटन को लाइसेंस मिलने के बाद से ही एचएमटी की स्थिति खराब होने लगी। टाइटन ने बाजार के अनुरूप अपने को ढाला और क्वार्ट्ज घड़ियों की श्रृंखला बाजार में उतारी। एचएमटी प्रबंधन ने अपने को अपडेट नहीं किया। वर्ष 1995 से एचएमटी का डाउन फाल शुरू हो गया।

जनता, कोहिनूर, पायलट और सोना थी पहली पसंद
एचएमटी वाच ग्रुप के स्वर्णिम दौर में कोहिनूर, पायलट, जनता ओर सोना के नाम से बनने वाली घड़ियां लोगों की पहली पसंद हुआ करती थी। इन घड़ियों की सबसे अधिक मांग थी। इनकी कीमत भी अधिक होती थी। इन क्वार्ट्ज घड़ियों की कीमत 11 सौ से 15 सौ रुपए के बीच है।

अतीत के मुहाने से एचएमटी

HMT company at rani bagh

इतिहास बनने जा रही एचएमटी की घड़ियों को लोग अब हाथों-हाथ ले रहे हैं। अतीत के मुहाने पर खड़े सबसे पुराने वॉच ग्रुप की घड़ियों को लोग बतौर यादगार खरीद रहे हैं। आइए जानते है इस घड़ी की पूरी कहानी...

एचएमटी रानीबाग यूनिट 1983 में स्थापित हुई और 1985 में कारखाने में उत्पादन शुरू हो गया। तब कारखाने में 1250 से अधिक अधिकारी एवं कर्मचारी थे। वर्ष 1990 से 1993 तक एचएमटी घड़ियों का स्वर्णिम दौर रहा।

रानीबाग यूनिट में प्रतिवर्ष 16 से 18 लाख घड़ियां बनती थीं। घड़ी खरीदने के लिए लोग इंतजार करते थे। शोरूमों में घड़ियों की मांग पूरी नहीं हो पाती थी। रानीबाग से घड़ियां बनकर दिल्ली जाती थीं।

प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए दस साल पहले एचएमटी ने क्वार्ट्ज घड़ियां बनानी शुरू की। प्राइवेट कंपनियों की आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन से एचएमटी की घड़ियां बाजार में टिक नहीं पाई।

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