फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   himalaya diwas 2020 : Himalaya Day 2020: Himalayas can refuse to pay price of development anytime

हिमालय दिवस 2020 : हिमालय कभी भी कर सकता है विकास की कीमत अदा करने से इनकार

Tue, 08 Sep 2020 11:27 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Tue, 08 Sep 2020 11:27 AM IST
सार

  • अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में पर्यावरण को हो रहे नुकसान को कम से कम करना भी जरूरी
  • कोविड काल में आयोजित हिमालय दिवस में इस पर भी मंथन जरूरी

विज्ञापन
himalaya diwas 2020 : Himalaya Day 2020: Himalayas can refuse to pay price of development anytime
हिमालय - फोटो : Pixabay

विस्तार

कोरोना के कारण भले ही चारों ओर त्राहि मची हुई हो लेकिन यही कोरोना है जिसने पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच के रिश्ते की पड़ताल और गहराई से करने का संकेत भी दिया है। 

विज्ञापन


कोरोना संक्रमण के लॉकडाउन दौर में यह भी सामने आया कि हवा, पानी आदि की गुणवत्ता में सुधार हुआ। यह तमाम आर्थिक गतिविधियों पर लगे ब्रेक का परिणाम भी था। अब अनलॉक में फिर आर्थिक गतिविधियां शुरू हुई हैं लेकिन एक सबक के साथ। यह सबक है-अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में पर्यावरण को नुकसान न पहुंचने देने का।
विज्ञापन


विशेषज्ञों की नजर में अर्थव्यवस्था ने बढ़ाने में पर्यावरण के नुकसान का आकलन न करने के हिमालय के संदर्भ में गंभीर परिणाम सामने आएंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय पहले ही दबाव में है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को परंपरागत तरीके से बढ़ाने में हिमालय पर यह दबाव बढ़ रहा है। उत्तराखंड में ही हर साल प्रदेश सरकार को मानसून के दौरान सड़कों के टूटने और भूस्खलन आदि के कारण करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह नुकसान प्रदेश के पर्यटन विभाग के कुल बजट से कहीं ज्यादा है। कई गांव महीनों तक सड़क टूटने के कारण अन्य क्षेत्रों से कटे हुए रहते हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन


विकास का यह तरीका एक और रूप में सामने आ रहा है। यह रूप हिमालयी क्षेत्र में नदियों, पर्वतों में अटे पड़े कूड़े के ढेर के रूप में सामने आ रहा है। प्लास्टिक कचरा बढ़ता ही जा रहा है और नगर निकाय इस कूड़े के ढेर को संभालने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में हिमालय कभी भी इस विकास की कीमत को अदा करने से इनकार कर सकता है। यह इनकार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के न रुक पाने वाले प्रभाव के रूप में सामने आ सकते हैं। 

2013 की आपदा का सबक जीईपी पर बढ़ाए थे कदम

2013 की केदारनाथ आपदा थी जिसने हिमालयी राज्यों को सकल पर्यावरणीय उत्पाद या जीईपी की ओर कदम बढ़ाने के लिए विवश किया था। इस आपदा के बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने जीईपी को प्रदेश में लागू करने के लिए कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी की बैठकें भी हुईं और फिर यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

कुछ समय पहले ही भारतीय वन्य जीव संस्थान में जीईपी को लेकर प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार की उपस्थिति में बैठक भी हुई और जीईपी के लिए फिर से कदम बढ़ाए गए। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश सरकार के स्तर से इस पर काम भी जारी है।


इसमें इस समय जीईपी को लेकर विभिन्न संस्थाओं से बात की जा रही है। हैस्को के संस्थापक निदेशक अनिल जोशी के मुताबिक कोशिश यह है कि जीईपी या सकल पर्यावरणीय उत्पाद इस तरह से विकसित किया जाए कि उसे व्यवहारिक रूप से लागू किया जा सके। 

जीडीपी बढ़ाने में पर्यावरण का नुकसान कम करना बहुत जरूरी

हिमालयी क्षेत्र में जीडीपी को बढ़ाते हुए पर्यावरण के नुकसान को कम से कम करना बहुत जरूरी है। ऐसा वर्तमान को ही नहीं बल्कि भविष्य को भी ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। हमारे यहां ग्रीन जीडीपी की बात तो खूब होती है लेकिन उसको समझने और उस पर अमल करने की कोशिश कम ही होती है। यह अब सभी स्वीकार कर रहे हैं कि हिमालय बेहद संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन और अन्य कारणों से यहां का पर्यावरण भी अति संवेदनशील है। 


यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि हिमालय का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। हिमालय पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। यह जैव विविधिता का भंडार है। कार्बन सिंक है। इसका नुकसान मतलब सबका नुकसान। जीडीपी को हम पूरी अर्थव्यवस्था का आकलन मान सकते हैं। ऐसे में ग्रीन जीडीपी का मतलब है अर्थव्यवस्था को इस तरह से आगे बढ़ाना कि पर्यावरण का नुकसान कम से कम हो। दूसरे शब्दों में अर्थव्यवस्था में पर्यावरण के नुकसान का आकलन कर उसे घटा देें तो ग्रीन जीडीपी निकल आएगी। इस पर काम होना चाहिए और हिमालय के संदर्भ में तो यह और भी जरूरी है। 2007 में तत्कालीन सरकार ने नेशनल ग्रीन अकाउंटिंग की बात की थी। यह मामला तब से उठा नहीं। इस तरह से देखा जाए तो ग्रीन जीडीपी को जीडीपी का करेक्शन कहा जा सकता है। - प्रोफेसर बीके जोशी, निदेशक दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, पूर्व कुलपति कुमाऊं विश्वविद्यालय

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed