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हिमालय दिवस 2019: वन्यजीवों को उनके घरों में ही चुनौती दे रहा मानव, पढ़ें ये खास रिपोर्ट...

सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 02 Sep 2019 08:20 AM IST
Himalaya Diwas 2019 Humans challenging wildlife in their homes special report
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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हिमालयी क्षेत्र अपने ग्लेश्यिरों, नदियों के साथ ही जंगलों के लिए भी जाना जाता है। यहां चिपको से वन संरक्षण की मुहिम शुरू होने से कई साल पहले ही वनों को देव देवताओं को समर्पित करने की परंपरा रही है। यही वन हैं, जो वन्यजीवों के घर भी हैं। विकास के नाम पर जंगलों पर हमला हुआ तो वन्यजीव भी प्रभावित हुए।
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अब वन्यजीव जंगलों से बाहर निकलने को विवश हैं। यही एक बड़ी वजह भी है कि मानव वन्यजीव संघर्ष के मामले भी बढ़ रहे हैं। हिमालय की सुरक्षा में एक बड़ा सवाल उसके वन्यजीवों के संरक्षण का भी है। वन्यजीव विशेषज्ञ भी साफ कह रहे हैं कि हमें वन्यजीवों को उनके घर में घुसकर चुनौती देने की आदत से बाज आना होगा

हालात बता रहे हैं कि हम वन्यजीवों के प्राकृतिक वास स्थलों से छेड़छाड़ में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। कभी साहसिक पर्यटन तो कभी दुर्गम तक सड़क के बहाने हम वन्यजीवों के घरों में घुस रहे हैं और उसके बाद उनसे डर कर उन्हें हिंसक, करार दे रहे हैं। 

वन्यजीव विशेषज्ञों की माने तो जंगलों की गुणवत्ता कई कारणों से प्रभावित हो रही है। अत्यधिक घने जंगल सिमट रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण वनों की संरचना बदल रही है। मसलन उत्तराखंड में चीड़ के पेड़ स्थानीय बांज को प्रतिस्थापित कर रहे हैं। इसके साथ ही शिकार और वन संपदा का अधिक दोहन भी वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है।

यही वजह है कि मध्य हिमालय में तेंदुए, गुलदार, भालू आदि वन्यजीव मानव आबादी की ओर रुख कर रहे हैं। हाथियाें, बाघों के आने-जाने के रास्तों में वाहनों का काफिला है और यह इन वन्यजीवोें को परेशान कर रहा है। यही हाल नदियों का भी है। स्नो ट्राउट से लेकर महाशीर तक पर संकट है। गंगा में डालफिन गिनी चुनी रह गई हैं। 

वन्यजीवों का प्राकृतिक वासस्थल वन हैं और यह वनों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है कि वन्यजीव कितने सुरक्षित रहते हैं और मानव आबादी की ओर रुख करने से बचते हैं। उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर के लिए 2017 में किया गया फारेस्ट सर्वे बता रहा है कि उत्तराखंड सबसे मुफीद स्थिति में है, लेकिन यहां भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सथ्याकुमार के मुताबिक हिमाचल में जंगलों ने विकास की कीमत अदा की है। इसी तरह जम्मू कश्मीर में फारेस्ट कवर बेहद कम है।

28 हजार प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर 
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर एक लाल सूची तैयार करती है, जिसमें उन वन्यजीवों और वनस्पतियों को शामिल किया जाता है, जिनके अस्तित्व पर संकट है। इस सूची के मुताबिक करीब 28 हजार प्रजातियां इस समय विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसमें 40 प्रतिशत उभयचर, 25 प्रतिशत स्तनपाई, 34 प्रतिशत कोनीफर्स, 14 प्रतिशत पक्षी शामिल हैं।
 
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488 दिन में चिह्नित करनी है 54268 प्रजातियां

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