ऐसा नहीं हुआ तो हरीश रावत को देना होगा इस्तीफा
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लोकसभा चुनाव के नतीजों के शोर के बाद उत्तराखंड में जल्द ही एक और राजनीतिक हलचल शुरू होने वाली है।
यह उस विधानसभा सीट के उप-चुनाव की सरगर्मी होगी जहां से जीत कर विधानसभा जाने की तैयारी मुख्यमंत्री कर रहे है।
हालांकि अभी सभी का ध्यान लोकसभा चुनाव के नतीजों पर है लेकिन जुलाई माह समाप्त होने से पहले हरीश रावत को विधानसभा का सदस्य बनना होगा।
नहीं था मोदी की व्यापक लहर का अंदाजा
शुरूआती दौर में मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए सीट ढूंढने वाली टीम ने चार पांच भाजपा विधायकों वाली सीटों में से एक खाली कराने की राय दी।
इनमें एक दो सीट हरिद्वार और एक दो ऊधमसिंहनगर की थीं। लेकिन तब नरेंद्र मोदी की इतनी व्यापक लहर का अंदाजा नहीं था। अब स्थिति उलट हो गई है।
भाजपा का तो शायद ही कोई विधायक सीट खाली करेगा। यदि नरेंद्र मोदी का असर ना होता तो शायद भाजपा विधायक मदन कौशिक हरिद्वार सीट से ही लोकसभा का चुनाव लड़ लिए होते।
रावत के लिए सीट तलाशने का काम
चीफ मिनिस्टर की शपथ हरीश ने एक फरवरी को ली थी। इसलिए 31 जुलाई तक विधानसभा का सदस्य बनना संवैधानिक बाध्यता है। वर्ना, इस्तीफा देना पड़ सकता है।
फिलहाल अब सीएम हरीश के लिए सीट तलाशने का काम हो रहा है। एक चांस यह भी है कि यदि निशंक हरिद्वार से सांसद निर्वाचित होते है तो हरीश डोईवाला के रास्ते विधानसभा जाने का प्रयास कर सकते है।
लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की डोईवाला सीट पर क्या स्थिति रही।
रेणुका जीतीं तो हरीश को जाना होगा कहीं और
यदि कांग्रेस ने संसदीय चुनाव हारने की स्थिति में भी इस सीट पर लंबी बढ़त ली तो फिर भी हरीश यहां से चुनाव लड़ सकते हैं।
क्योंकि इस सीट पर पांच से छह हजार के बीच कुमाऊंनी वोटर भी हैं। और, यदि रेणुका रावत जीतती हैं तो फिर हरीश को कहीं अन्यत्र जाना होगा।
यह संभावना ज्यादा प्रबल हो रही है कि कांग्रेस अपने ही किसी विधायक से इस्तीफा दिलाकर हरीश को उप-चुनाव लड़ाएगी। और, इसकी संभावना कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ व चम्पावत जिलों में सर्वाधिक है।
नमो लहर के बाद हरीश को सीट तलाशते समय यह ध्यान भी रखना होगा कि सर्वाधिक सुरक्षित सीट कौन सी होगी।
जहां पर जातिगत या फिर सामाजिक समीकरणों के आधार पर चुनाव जीता जा सके।