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बहुगुणा सरकार को नहीं 'भाया' लोकायुक्त बिल

Sat, 19 Oct 2013 10:36 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 19 Oct 2013 10:36 AM IST
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government revise Lokayukta Bill

उत्तराखंड में लोकायुक्त को राष्ट्रपति द्वारा मंजूरी मिलने के बाद राजनीति तेज हो गई है।

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नया विधेयक लाने का फैसला
भाजपा की बीसी खंडूड़ी सरकार में पारित हुए लोकायुक्त विधेयक को संशोधित करने अथवा उसे निरस्त कर अपना अलग से नया विधेयक लाने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि भाजपा के विधेयक में कई असंवैधानिक प्रावधान हैं।

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राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद सशक्त लोकायुक्त का श्रेय लूटने में लगी भाजपा को प्रदेश सरकार ने झटका देने का मन बना लिया है। प्रदेश सरकार अपने तरीके से इस विधेयक को लागू करना चाह रही है। इसके लिए विधेयक में जरूरी संशोधन करने की बात कह रही है।
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शुक्रवार को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मीडिया से साफ कहा कि संबंधित विधेयक के कई प्रावधान असंवैधानिक हैं। खासकर निचली अदालतों को इसके दायरे में ला दिया गया है, जो कि संविधान के विरुद्ध है।

विधेयक का अध्ययन कर होगा आवश्यक संशोधन
सरकार विधेयक का अध्ययन करने के बाद इसमें आवश्यक संशोधन करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि जरूरी हुआ तो इस विधेयक को बदल कर नया विधेयक बनाया जाएगा। यह अधिकार राज्य सरकार के पास है।

उन्होंने कहा कि गुजरात में लोकायुक्त को लेकर क्या हुआ, सभी को पता है। ऐसे हालात यहां न बने, इसके लिए जैसा देश के अन्य राज्यों में है उसी तरह का विधेयक तैयार कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि केंद्र में लोकपाल विधेयक विचाराधीन है।

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उसके भी कई बिंदु हैं, जिन्हें देखना होगा। असंवैधानिक प्रावधान होते हुए भी राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर हस्ताक्षर क्यों किया गया? इस सवाल पर मुख्यमंत्री ने कहा कि एक व्यवस्था के तहत राज्यों से जाने वाले विधेयकों पर राष्ट्रपति सामान्य तौर पर हस्ताक्षर कर ही देते हैं।


बिल मंजूरी की भनक न लगने की जांच शुरू
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद चौबीस दिन से विधेयक की किसी को भनक नहीं लगने देने की जांच शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बताया कि इस मामले को मुख्य सचिव देख रहे हैं।

उन्होंने माना कि विभागों के बीच आपसी तालमेल की कमी भी इस चूक का एक बड़ा कारण है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विधायी विभाग के प्रमुख सचिव ने आठ-दस दिन पहले ही ज्वाइन किया है। लेकिन 9 सितंबर को दिल्ली से विधेयक के आने के बाद बिना मुख्यमंत्री सचिवालय, मुख्य सचिव, विभागीय मंत्री को जानकारी दिए, सीधे प्रिंटिंग के लिए भेज देना ठीक नहीं है।

180 दिन सरकार के पास इसे क्रियान्वित करने के हैं। जरूरी होने पर सरकार इसमें संशोधन भी करना चाहेगी। विधायी विभाग ने जैसा किया, इसका कोई औचित्य नहीं था। यह पूरी तरह अनुचित है।

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