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उत्तराखंडः अंग्रेजों से जीते पर अपनों से हारे आजादी के परवाने

Sun, 16 Aug 2015 07:55 PM IST
निशांत खनी/ अमर उजाला, हल्द्वानी
निशांत खनी/ अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Sun, 16 Aug 2015 07:55 PM IST
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government acquired freedom fighter's parental land.

देश की आजादी के लिए अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने वाले शिवराज सिंह फर्त्याल आज अपनों से हार गए हैं।

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शिवराज सिंह के दशकों के संघर्ष के बाद सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान दिया। मगर सरकार ने उनके परिवार को स्वतंत्रता सेनानी कोटे से जमीन और सुविधाएं तो नहीं दी, उल्टा उनकी ही पैतृक जमीन अधिग्रहण कर ली। जमीन के मुआवजे के लिए पिछले एक दशक से उनका परिवार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।

मूलरूप से अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा निवासी शिवराज सिंह फर्त्याल का परिवार हल्द्वानी अमरावती कालोनी फेज तीन में रहता है। शिवराज सिंह ने आजादी के लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ झंडा बुलंद किया। तब वे अल्मोड़ा जीआईसी में पढ़ते थे।
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92 वर्षीय शिवराज सिंह बताते हैं कि आजादी की मशाल जलाने पर उन्हें और उनके साथियों को स्कूल से कोडे़ मारकर निकाल दिया। उन्हें 19 कोड़े मारे गए। शिवराज सिंह बताते हैं कि इसके बाद भी उनकी हिम्मत नहीं टूटी। अल्मोड़ा में आंदोलन में प्रतिभाग किया।

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शासन एवं प्रशासन से लेकर लेकर नेताओं के चक्कर काटे

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शिवराज सिंह बताते हैं कि देश की आजादी के बाद दशकों तक उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का सम्मान नहीं मिला। उन्होंने शासन एवं प्रशासन से लेकर लेकर नेताओं के चक्कर काटे।

आखिरकार 2006 में उनके संघर्ष के आगे सरकार झुकी और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का सम्मान से नवाजा गया। कांग्रेसी नेता ललित जोशी ने उनकी बात सरकार तक पहुंचाने में मदद की।

शिवराज के बेटे जितेंद्र सिंह बताते हैं सरकार ने 2008 में गांव की सड़क बनाने के लिए उनकी पैतृक जमीन 13 नाली अधिग्रहण कर ली। उन्हें इसका मुआवजा तक नहीं दिया।

मुआवजे के लिए पिता शिवराज सिंह ने अल्मोड़ा जिले में सरकारी दफ्तरों की काफी दौड़भाग की, लेकिन उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। जितेंद्र बताते हैं सरकारी सिस्टम से पिता बेहद आहत हैं। शिवराज के तीन बेटे हैं। बड़े बेटे जितेंद्र का खुद का कारोबार है। मझला बेटा केएस फर्त्याल सेना में कर्नल और छोटा बेटा आरएस ग्रुप में उपाध्यक्ष हैं।

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