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बच्ची की सारी नाड़ियां टूटी तो डॉक्टर ने किया 'चमत्कार'

Fri, 22 May 2015 01:36 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, श्रीनगर
ब्यूरो / अमर उजाला, श्रीनगर Updated Fri, 22 May 2015 01:36 PM IST
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glucose drip in bone marrow.

उत्तराखंड के श्रीनगर में मासूम बच्ची का जीवन बचाने के लिए डॉक्टरों ने चमत्कार कर डाला। पढ़ें, डॉक्टरी का चमत्कार...

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डिहाइड्रे्शन (शरीर में पानी की कमी) से पीड़ित डेढ़ साल की सोनाली को श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर ने नया जीवन दिया है। बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. आनंद जैन ने बच्ची के बोन मेरो (अस्थि मज्जा) में सीधे ग्लूकोज चढ़ाकर उसकी जान बचाई।

डॉ. जैन का दावा है कि मेडिकल कालेज श्रीनगर के इतिहास में ऐसा पहली बार किया गया है। श्रीनगर के ब्राह्मण मोहल्ला निवासी विकास की डेढ़ साल की बेटी सोनाली को 19 मई की रात गंभीर हालात में मेडिकल कॉलेज से संबद्ध बेस अस्पताल भर्ती किया गया।
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सोनाली 24 घंटे से उल्टी और खूनी दस्त हो रहे थे। उसके शरीर में पानी की कमी हो गई। उसकी सांस बहुत धीमी चल रही थी। रक्तचाप इतना कम था कि जिसका माप करना संभव नहीं था। यदि उसे तत्काल ग्लूकोज नहीं चढ़ाया जाता, तो मासूम की जान खतरे पड़ जाती।
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बाल रोग वार्ड में तैनात स्टाफ ने ग्लूकोज देने की कोशिश की। लेकिन यह कोशिश असफल रही। इसके बाद एनआईसीयू (जो छोटे शिशु को ग्लूकोज देने में दक्ष माने जाते हैं) के स्टाफ को बुलाया गया। लेकिन वह भी हार गए।

रक्तचाप की कमी से टूट गई थी नाड़ियां

glucose drip in bone marrow.

मामले की गंभीरता को देखते हुए वार्ड में तैनात जूनियर रेजीडेंट चिकित्सकों ने विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद जैन को बुलाया। उन्होंने वेनफांइडर (रक्त वाहिनी को ढूंढने वाला उपकरण) के माध्यम से जांच की, तो पता चला कि रक्तचाप की कमी से बच्ची की नाड़ियां जगह-जगह से टूट गई हैं। जिससे ग्लूकोज चढ़ाना संभव नहीं।

डॉ. जैन ने बताया कि रात लगभग साढ़े 11 बजे बच्ची की पैर की हड्डी में छेद कर ग्लूकोज को रक्त वाहनियों तक पहुंचाया गया। 30 मिनट में तेजी से 360 मिली ग्लूकोज चढ़ाकर बच्ची के रक्तचाप को सामान्य लाने की कोशिश की गई। उन्होंने बताया कि पानी की कमी से शरीर में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है।

इसलिए ग्लूकोज चढ़ाकर उसको सामान्य किया गया। बच्ची चिकित्सकों की देखरेख में है और धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। डॉ. जैन ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में ऐसा पहली बार हुआ है, जब हड्डी के माध्यम से रक्त वाहनियों तक ग्लूकोज पहुंचाकर बच्ची की जान बचाई गई।

शरीर में पानी की कमी हो जाने की वजह से जब नसें नहीं मिलतीं तो अस्थि मज्जा में सीधे ग्लूकोज, ब्लड और दवाएं दी जाती हैं। इस तरह से कई गंभीर बाल रोगियों को बचाया गया है।
- डॉ. जेपी देवशाली, वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ, दून ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स

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