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गांधी जयंती: बापू ने तीर्थनगरी हरिद्वार में लिया था पांच वस्तुएं लेने का कठिन व्रत, जीवनभर किया पालन

Sat, 02 Oct 2021 11:11 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार
कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 02 Oct 2021 11:11 AM IST
सार

सार्वजनिक शौचालयों में भारी दुर्गंध को देखते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसी धर्मनगरी हरिद्वार में झाड़ू उठाई। फिर जीवनभर अपने आश्रम का शौचालय उन्होंने खुद ही साफ किया। 

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Gandhi Jayanti 2021: Bapu had take difficult resolution of taking five things in Haridwar, followed it throughout his life
महात्मा गांधी - फोटो : Facebook/MokamOfficial

विस्तार

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हरिद्वार में गंगातट पर कुछ बड़े संकल्प लिए। इनका उन्होंने जीवनभर अक्षरश: पालन किया। संकल्पों में प्रमुख था प्रतिदिन केवल पांच वस्तुएं लेने का कठिन व्रत।

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सार्वजनिक शौचालयों में भारी दुर्गंध को देखते हुए उन्होंने इसी धर्मनगरी में झाड़ू उठाई। फिर जीवनभर अपने आश्रम का शौचालय उन्होंने खुद ही साफ किया। 

हरिद्वार आने वाली रेलगाड़ी में हिंदू पानी, मुस्लिम पानी का प्रबंध देखकर उन्होंने तीसरा संकल्प लिया कि वह आजीवन छुआछूत का विरोध करेंगे। बापू ने इसी पावन भूमि पर रात्रि भोजन का त्याग किया। शराब और सिगरेट कभी न लेने का निर्णय भी उन्होंने यहीं लिया। बापू ने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में कुंभ मेले में लिए गए इन निर्णयों को कुंभ संकल्प नाम दिया। साउथ अफ्रीका से स्वदेश लौटने के बाद बापू अपने गुरु गोपालकृष्ण गोखले से मिलने उनके आश्रम गए। 
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उन्होंने गुरु से देश की आजादी के लिए काम करने की प्रबल इच्छा जताई। तब गोखले ने उनसे कहा कि 1915 में हरिद्वार में कुंभ है, वहां जाओ। कुंभ में तुम्हें भारत को जानने का अवसर सहज मिल जाएगा। साथ ही गंगा ने निर्जन तट पर कांगड़ी ग्राम में गुरुकुल बनाकर आजादी के सूत्र गढ़ रहे महात्मा मुंशीराम से अवश्य मिलना। मुंशीराम बाद में स्वामी श्रद्धानंद के रूप में विख्यात हुए। 

बापू ने स्वयं झाड़ू उठाया और कुंभ क्षेत्र के शौचालय साफ किए

आत्मकथा में बापू लिखते हैं कि जिस रेलगाड़ी से वह हरिद्वार आ रहे थे, वहां हिंदू पानी और मुस्लिम पानी बेचने वाले अलग-अलग लोग आ रहे थे। मुसलमान हिंदू पानी नहीं पीते थे और हिंदू मुस्लिम पानी। हरिद्वार आकर बापू ने कुंभ की भारी भीड़ देखी। उन्होंने लिखा कि मेले में 17 लाख श्रद्धालु थे।

इसके विपरीत अस्थायी शौचालय बहुत कम और बेहद बुरी दुर्गंध से भरे हुए थे। तब बापू ने स्वयं झाड़ू उठाया और कुंभ क्षेत्र के शौचालय साफ किए। बापू ने देखा कि शूद्रों के गंगा स्नान के लिए अलग घाट बनाए गए थे।

स्वामी श्रद्धानंद से मिलने के बाद बापू के ज्ञानचक्षु खुल गए। कुंभ क्षेत्र में हरकी पैड़ी के पास बैठकर उन्होंने भारतवासियों की गरीबी, लेकिन कड़े आत्मबल का दर्शन अपनी आंखों से किया। 

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