उत्तराखंड के पहाड़ों में चार दशक पुराने तांबा उद्योग की चमक पड़ी फीकी
- पुस्तैनी धंधा छोड़ कर पलायन कर रहे ताम्र शिल्पी
- अब शोपीस बन कर रह गए तांबे व पीतल से बने बर्तन
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उत्तराखंड के पहाड़ों में चार दशक पुराने तांबा उद्योग की चमक फीकी पड़ गई है। तांबे के कारीगर पुस्तैनी धंधे को छोड़कर पलायन कर रहे हैं, जबकि वर्षों पहले तांबे और पीतल के बर्तन व अन्य सामान बनाने का कारोबार शिल्पियों के लिए आजीविका का बड़ा साधन था। लेकिन प्लास्टिक के तैयार सस्ते सामान बाजार में आने से तांबे से बनी वस्तुएं शोपीस बन कर रह गई हैं।
करीब 400 साल पुराना अल्मोड़ा का प्रसिद्ध तांबा उद्योग ने ही अल्मोड़ा को ताम्र नगरी के रूप में पहचान दिलाई दी थी। करीब तीन दशक पहले तक अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ले में करीब 72 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े थे और हर परिवार का अपना कारखाना था। इस उद्योग के जरिए करीब 200 कारीगरों को रोजगार मिला था। लेकिन हाल के वर्षों में मशीनीकरण के आगे यहां के ताम्र कारीगर नहीं टिक पाए।
वर्तमान में 10 ताम्र शिल्पी ही पुस्तैनी व्यवसाय में लगे हैं। उनके पास भी पहले जैसा काम नहीं रहा। जनपद के अधिकतर तांबे के कारीगर रोजगार की तलाश में पलायन कर चुके हैं या उन्होंने दूसरा व्यवसाय को चुन लिया है। प्रदेश के अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली जनपद के कारीगरों के बनाए तांबे के बर्तनों की अपनी पहचान थी।
एक जमाने में इस उद्योग से जुड़े कारीगरों को अच्छे आय होती थी। मशीनीकरण ने कारीगरों के हाथों से बर्तनों व अन्य वस्तुओं की चमक फीकी दी है। शिल्पी थोड़ा बहुत कच्चा माल लेकर बर्तन व अन्य सजावटी सामान बना कर स्थानीय व्यवसायियों को बिक्री के लिए उपलब्ध कराते हैं। इनकी कीमत अधिक होने से खरीददार कम मिलते हैं।
काफी मेहनत करने के बाद महीने में करीब चार-पांच हजार रुपये कमा पाते हैं। एक दौर में लोग तांबे के फिल्टर तक कारीगरों से ही बनवाते थे। लेकिन अब अधिकांश लोग फिल्टर की जगह वाटर प्यूरीफायर खरीद रहे हैं। अब शादी में भी लोग मशीन से बने तांबे के बर्तन खरीद लेते हैं। अब इस कारोबार से आजीविका चलाना मुश्किल है।
- नवीन कुमार टम्टा, तांबे के शिल्पी
15 साल पहले इतना काम होता था कि 12-12 घंटे काम करते थे। लेकिन तांबे का काम ही नहीं है। अधिकतर कारीगरों ने यह काम छोड़ दिया है। खास तौर पर नई पीढ़ी को इस कार्य के प्रति कोई रुचि नहीं रह गई है।
- संजय कुमार टम्टा, शिल्पी
पहाड़ों में खत्म हो रहा तांबे के बर्तनों का प्रचलन
तांबे से पारंपरिक रूप से बने बर्तनों की कभी विणपन की कोई समस्या नहीं थी। स्थानीय स्तर पर लगने वाले मेलों में कारीगरों के हाथों से बने बर्तनों की काफी डिमांड रहती थी।
शादी व धार्मिक आयोजन में तांबे व पीतल से बने बर्तनों पर खाना बनता था। लेकिन अब धीरे-धीरे इसका प्रचलन खत्म हो रहा है। गागर, तौला, परात, सुरई, पंच पात्र, दीप दान, वाद्य यंत्र रणसिंह, तुतरी, ढोल, नगाड़े, वाटर फिल्टर, लैंप स्टैंड, घर के सजावटी सामान की अपनी अलग पहचान थी।
सरकार संरक्षण दे तो चकमेगा तांबा उद्योग
बागेश्वर जनपद के ग्राम चौगांवछीना निवासी नवलकिशोर टम्टा बताते हैं कि पहले खरही क्षेत्र की पहचान ही तांबा उद्योग था। तब हस्तशिल्पियों की आय वेतनभोगी कर्मचारियों से अधिक होती थी। लेकिन अब यह व्यवसाय फायदेमंद नहीं रहा। मशीनीकरण के बाद रामनगर से तांबे के सस्ता बर्तन आने से भी कारोबार को नुकसान हुआ है। सरकार इस प्राचीन उद्योग को संरक्षण व विपणन की व्यवस्था करे तो पहाड़ों से पलायन रुकेगा।