चीन सीमा की सुरक्षा पर आड़े आ रहा वन कानून
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चीन सीमा के साथ लगते उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में भारतीय सेना की विस्तारीकरण योजना के आड़े 11 हजार हरे पेड़ आ रहे हैं।
सेना के माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन के तहत इस क्षेत्र में स्वतंत्र इंफेंट्री ब्रिगेड की संरचना प्रस्तावित है। सेना के सर्वेक्षण के बाद भूमि हस्तांतरण पर कटने वाले पेड़ों की बड़ी संख्या को देखते हुए शासन ने नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क को फिलहाल मंजूरी नहीं दी है।
पेड़ों के कटान के लिए गठित कमेटी मार्च माह में स्टेट बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ की प्रस्तावित बैठक में इस पर फैसला लेगी। इसके बाद ही स्थिति साफ होगी। उर्गम घाटी में सेना ने स्वतंत्र इंफेंट्री ब्रिगेड की स्थापना के लिए नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क से 390 हेक्टेयर भूमि मांगी थी।
पार्क प्रशासन ने शासन से यह भूमि देने की मांग की थी। सेना ने यहां 1400 हेक्टेयर भूमि का सर्वेक्षण कार्य भी पूर्ण किया है। उक्त भूमि में करीब 11 हजार बांज, खर्सू, मौरु और बुरांस के पेड़ मौजूद हैं। उर्गम घाटी के नंदी कुंड से चीन सीमा मात्र 5 किमी की हवाई दूरी पर स्थित है, जबकि यहां से करीब 18 किमी की पैदल दूरी तय कर सीमा पर पहुंचा जा सकता है।
माउंटेन स्ट्राइक कोर का है हिस्सा
भारतीय सेना चीन सीमा के साथ अपनी सैन्य तैनाती मजबूत करने लिए माउंटेन स्ट्राइक कोर गठित कर रही है। वर्ष 2019 तक कोर का गठन होना है। इसका मुख्यालय फिलहाल पनागढ़ (पश्चिम बंगाल) में होगा।
इसी के तहत चीन सीमा पर दो स्वतंत्र इन्फेंट्री और दो स्वतंत्र आर्म्ड बिग्रेड स्थापित करने को मंजूरी मिली है। यह ब्रिगेड जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड और सिक्किम में तैनात होनी हैं, जिसके लिए वन एवं पर्यावरण संबंधी अनापत्तियां ली जा रही हैं। उत्तराखंड के चमोली में स्वतंत्र इंफेंट्री ब्रिगेड स्थापित की जानी है।
11 हजार या 30 हजार पेड़?
उर्गम क्षेत्र में ब्रिगेड की स्थापना के लिए नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क, गढ़वाल स्काउट के कमान अधिकारी व तहसील प्रशासन के अधिकारियों ने मौके पर जाकर करीब 11 हजार पेड़ों का चिन्हीकरण किया। स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो जिस दायरे में ब्रिगेड की स्थापना होगी, वहां छोटे-बडे़ करीब 30 हजार पेड़ मौजूद हैं।
यह सेना और शासन का मामला है। मामले में शासन द्वारा ही अंतिम निर्णय लिया जाना है। इसमें जिला प्रशासन कुछ नहीं कर सकता है।
- अशोक कुमार, डीएम चमोली
सेना को अरसे से अनापत्ति का इंतजार
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
उत्तराखंड की साढ़े तीन सौ किलोमीटर लंबी चीन सीमा पर सैन्य तैनाती को मजबूत करने की महत्वाकांक्षी योजनाओं की चाल सुस्त है। इसकी वजह कुछ तो वन कानूनों का मकड़जाल और कुछ पर्यावरणीय चिंताओं का समाधान ढूंढने में हो रही देरी है। रक्षा मंत्रालय की कई अर्जियां अनापत्ति प्रमाणपत्र के इंतजार में हैं।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जितनी अड़ंगेबाजी कम होगी सीमांत क्षेत्र में सेना की तैनाती और सहूलियतों की राह उतनी आसान होगी। गौरतलब है कि प्रदेश में चीन सीमा पर सामरिक मजबूती के लिए एक नई माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन और राज्य में स्वतंत्र इंफेंट्री ब्रिगेड स्थापित करने की मंजूरी मिली है।
सीमा पर निगरानी और युद्धाभ्यास के लिए प्रस्तावित फील्ड फायरिंग रेंज जैसी योजनाएं भी पाइपलाइन में हैं। राज्य में मानव रहित विमान के लिए दो बेस बनाए जाने के साथ हेलीकाप्टरों के लिए हेली बेस नेटवर्क के निर्माण भी प्रस्तावित हैं। फील्ड फायरिंग रेंज के लिए भी भूमि उपलब्ध नहीं हो पाई है।
वन क्षेत्रों में प्रस्तावित योजनाओं में आ रही अड़चन
सैन्य योजनाएं वन क्षेत्रों में प्रस्तावित है जिससे इनमें सबसे बड़ी अड़चन भूमि हस्तांतरण के साथ वन एवं पर्यावरण की अनापत्तियां है।
परियोजनाओं के आडे़ आ रही भूमि संबंधी दिक्कतों पर वर्ष 2012 में सिविल मिलिट्री लाइजनिंग कान्फ्रेंस में प्रदेश सरकार और उच्च सैन्य अधिकारियों के बीच वार्ता हुई। इस वार्ता से भूमि चिन्हीकरण की प्रक्रिया तो तेज हुई, लेकिन अब भी अधिकांश योजनाएं वन एवं पर्यावरण अनापत्तियों का अड़ंगा झेल रही हैं।
यूएवी बेस के आड़े वन भूमि
सेना ने पंतनगर या नैनीसैणी में अपना एक यूएवी (मानव रहित विमान) बेस बनाने के लिए प्रस्ताव राज्य सरकार को अक्तूबर 2012 में दिया था। राज्य सरकार ने मानव सहित विमान बेस बनाने के लिए भूमि अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) दे दिया है। पंतनगर में 70 एकड़ भूमि इसके लिए चिह्नित है, लेकिन पेड़ कटान की एनओसी के चलते परियोजना का एक हिस्सा लंबित पड़ा है।
फील्ड फायरिंग रेंज भी वन क्षेत्र में प्रस्तावित
चीन के साथ तैनाती के लिए सेना अपनी मध्यम और हल्की तोपों के लिए अभ्यास क्षेत्र का प्रस्ताव भी राज्य को दे चुकी है। नंदादेवी और गंगोत्री क्षेत्र इसके लिए चयनित किए हैं।
गंगोत्री में संवेदी क्षेत्र (इको सेंसिटिव जोन) अधिसूचित है जबकि नंदा देवी रिजर्व फारेस्ट है। यहां 45 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र फील्ड फायरिंग रेंज के लिए चाहिए। प्रस्ताव वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनापत्ति के इंतजार में है।
सेना का आधारभूत ढांचा विकसित करना जरूरी
चीन सीमा पर भारतीय सेना की जरूरत के अनुरूप आधारभूत ढांचा विकसित करना जरूरी है। प्रदेश के सीमांत क्षेत्र में 12 ऐसे दर्रे हैं जो बेहद संवेदनशील हैं। वहां तक सेना की तैनाती बढ़ाने के साथ सीमा तक पहुंच आसान बनानी होगी। सामरिक महत्व की सैन्य परियोजनाओं पर लगने वाले अड़ंगे जितने कम होंगे उतनी तेजी से विकास हो सके गा।
- लेफ्टिनेंट जनरल एमसी भंडारी (रिटायर्ड)