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संतों को मंजूर नहीं 'महिलाओं' की यह मांग

Tue, 11 Feb 2014 10:06 AM IST
अमर उजाला, हरिद्वार
अमर उजाला, हरिद्वार Updated Tue, 11 Feb 2014 10:06 AM IST
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Female saints wants separate akhara

प्रयाग में महिला संतों की ओर से अलग अखाड़ा बनाने के प्रयासों को अखाड़ा परिषद और संत जगत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपराओं में परिवर्तन का अधिकार किसी को नहीं हैं।

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गुमराह होने की जरूरत नहीं
महिला संतों को सभी अखाड़ों में व्यापक सम्मान मिला हुआ है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत ज्ञानदास ने कहा कि किसी को गुमराह होने की जरूरत नहीं हैं। संन्यासियों, बैरागियों, उदासियों और निर्मलों के 13 अखाड़े हैं।

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महिला शंकराचार्य का कोई पद नहीं

Female saints wants separate akhara
इन 13 अखाडों में महिला वाड़े अलग से मौजूद हैं। महिलाओं को अखाड़ों में न केवल सम्मान मिलता है बल्कि उन्हें महामंडलेश्वर जैसे पदों पर आसीन भी किया जाता है।

देश में महिला शंकराचार्य का कोई पद नहीं हैं। जो महिला विभेद पैदा कर रही हैं, उन्हें संत जगत पहचानता नहीं।

पुरुष संतों की भांति सम्मान

Female saints wants separate akhara
निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर संतोषी माता ने कहा कि 13 अखाड़ों में महिलाओं का कभी अपमान नहीं हुआ। वह स्वयं महामंडलेश्वर हैं। सभी सभाओं में उन्हें पुरुष संतों की भांति सम्मान मिलता है।

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आत्मशक्ति पीठ की परमाध्यक्ष मां ज्ञानमयी विज्ञानानंद पुरी ने कहा कि भारत में महिलाओं की पूजा अनादि काल से होती आई है। अलग महिला अखाड़े का प्रयास बहुत हल्का और बेमानी है।

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अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरी ने फोन पर कहा कि महिला अखाड़े की बात उनके संज्ञान में है। प्रयाग में वार्ता के बाद कुछ कह पाएंगे।
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परंपरा कोई तोड़ नहीं सकता

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अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता बाबा हठयोगी दिगंबर ने कहा कि देश संत समाज महाशक्तियों का उपासक रहा है। कुंभ की शाहियों में महिला संत रथों पर सवार होकर चलती हैं। पुरुष संत उनके पीछे पैदल चलते हैं। यह परंपरा है, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता।

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महानिर्वाणी के सचिव श्रीमहंत रविंद्र पुरी ने कहा कि कोई स्त्री अथवा पुरुष संत नई परंपरा की शुरुआत नहीं कर सकता। ऐसा तमाशा करने का प्रयास जब भी किया गया, मुंह की खानी पड़ी। कोई भी अखाड़ा महिलाओं के खिलाफ नहीं हैं।

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जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपराओं को बदला नहीं जा सकता। महिला संतों के लिए अलग से अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता।
- महामंडलेश्वर संतोषी माता

जो संत बन गया, उसके लिए क्या पुरुष और क्या स्त्री।
- मां ज्ञानमयी

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