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मिसाल: पुरुष वर्चस्व को तोड़ कौशल्या ने ‘हल’ से किया रोजी रोटी के मुश्किल सवाल को हल, सोशल मीडिया पर भी छाई

Fri, 17 Jul 2020 01:49 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पौड़ी
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पौड़ी Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 17 Jul 2020 01:49 PM IST
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Example: Kaushalya broke male supremacy with Plowing the fields
- फोटो : amar ujala

पति की मौत के बाद कौशल्या के सामने अपने और अपने चार बच्चों के पेट भरने का सवाल था। इन सवालों का हल उन्हें 'हल' में नजर आया। फिर क्या था, उन्होंने गांव वालों की परवाह किए बगैर हल को ही अपनी आजीविका का साधन बना लिया।


 
Example: Kaushalya broke male supremacy with Plowing the fields
- फोटो : social media

इस वक्त कठूड़ गांव की कौशल्या खेतों में हल जोतने से पुरुष वर्चस्व को तोड़ नारी शक्ति की प्रतीक बनी हैं। वह कोई एक दो नहीं, बल्कि आठ गांवों के करीब 15 परिवारों के खेतों को जोत रही हैं।कौशल्या बताती हैं कि उनके पति की आठ साल पहले मौत हो गई थी। वह भी गांव में मजदूरी करते थे। वह परिवार में अकेले कमाने वाले थे।

Example: Kaushalya broke male supremacy with Plowing the fields
- फोटो : social media

उनकी मौत के बाद कुछ समझ नहीं आया। ऐसे में सारी समस्या का हल एक मात्र 'हल' दिख रहा था। सो बगैर ज्यादा सोचे इसी से गुजारा करने की सोच ली। बकौल कौशल्या वह हल के जरिये हर सीजन में 10 हजार से लेकर 12 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। इसके अलावा वह मेहनत-मजदूरी से भी पीछे नहीं हटतीं। इससे भी करीब पांच हजार रुपये कमाई कर लेती हैं।
 

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Example: Kaushalya broke male supremacy with Plowing the fields
- फोटो : social media

कौशल्या क्षेत्र के कंडोल, गैर, नवन, श्रीखोन, स्यालंगी, घुड़दौड़ी, खडेत, पंचूर, पाबौ, फलस्वाड़ी आदि गांवों में हल जोत रही हैं। कौशल्या बताती हैं कि शुरुआत में वह सामाजिक रूप से काफी असहज महसूस करती थीं, लेकिन अब सभी लोगों ने उसकी मेहनत को स्वीकार लिया है। बच्चों को पढ़ाकर कौशल्या काबिल बना रही हैं। उनकी तीन बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी इंटर पास कर चुकी है। दूसरी बेटी 12वीं, तीसरी 10वीं और बेटा 7वीं कक्षा में पढ़ रहा है।
 

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Example: Kaushalya broke male supremacy with Plowing the fields
- फोटो : social media
हल जोतने के कार्य में पुरुषों का एकाधिकार तोड़ने वालीं कौशल्या गांव ही नहीं, पूरे उत्तराखंड के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वह शक्ति की प्रतीक हैं।
-दीपक रावत, ग्राम प्रधान

कौशल्या बताती हैं कि कोरोना संक्रमण काल में उनकी आय बढ़ी है। उन्होंने बताया कि जो प्रवासी गांवों में लौटे हैं, वे खेती में रुचि ले रहे हैं। अब वह उनके खेतों में भी हल जोत रही हैं।
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