पति की मौत के बाद कौशल्या के सामने अपने और अपने चार बच्चों के पेट भरने का सवाल था। इन सवालों का हल उन्हें 'हल' में नजर आया। फिर क्या था, उन्होंने गांव वालों की परवाह किए बगैर हल को ही अपनी आजीविका का साधन बना लिया।
मिसाल: पुरुष वर्चस्व को तोड़ कौशल्या ने ‘हल’ से किया रोजी रोटी के मुश्किल सवाल को हल, सोशल मीडिया पर भी छाई
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इस वक्त कठूड़ गांव की कौशल्या खेतों में हल जोतने से पुरुष वर्चस्व को तोड़ नारी शक्ति की प्रतीक बनी हैं। वह कोई एक दो नहीं, बल्कि आठ गांवों के करीब 15 परिवारों के खेतों को जोत रही हैं।कौशल्या बताती हैं कि उनके पति की आठ साल पहले मौत हो गई थी। वह भी गांव में मजदूरी करते थे। वह परिवार में अकेले कमाने वाले थे।
उनकी मौत के बाद कुछ समझ नहीं आया। ऐसे में सारी समस्या का हल एक मात्र 'हल' दिख रहा था। सो बगैर ज्यादा सोचे इसी से गुजारा करने की सोच ली। बकौल कौशल्या वह हल के जरिये हर सीजन में 10 हजार से लेकर 12 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। इसके अलावा वह मेहनत-मजदूरी से भी पीछे नहीं हटतीं। इससे भी करीब पांच हजार रुपये कमाई कर लेती हैं।
कौशल्या क्षेत्र के कंडोल, गैर, नवन, श्रीखोन, स्यालंगी, घुड़दौड़ी, खडेत, पंचूर, पाबौ, फलस्वाड़ी आदि गांवों में हल जोत रही हैं। कौशल्या बताती हैं कि शुरुआत में वह सामाजिक रूप से काफी असहज महसूस करती थीं, लेकिन अब सभी लोगों ने उसकी मेहनत को स्वीकार लिया है। बच्चों को पढ़ाकर कौशल्या काबिल बना रही हैं। उनकी तीन बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी इंटर पास कर चुकी है। दूसरी बेटी 12वीं, तीसरी 10वीं और बेटा 7वीं कक्षा में पढ़ रहा है।
-दीपक रावत, ग्राम प्रधान
कौशल्या बताती हैं कि कोरोना संक्रमण काल में उनकी आय बढ़ी है। उन्होंने बताया कि जो प्रवासी गांवों में लौटे हैं, वे खेती में रुचि ले रहे हैं। अब वह उनके खेतों में भी हल जोत रही हैं।