मातृभाषा उत्सव: मंच पर जीवंत हुआ उत्तराखंड का लोकजीवन और संस्कृति, छात्र-छात्राओं ने दिखाई प्रतिभा
किसान भवन सभागार में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम 18 भाषाओं के जानकार जुटेंगे। उत्तराखंड की लोक भाषाओं जैसे गढ़वाली, कुमाऊंनी जौनसारी, जाड़, मरछा आदि में बच्चों को लोक भाषाओं में संवाद, लोकगीत और लोक कथा के माध्यम से अभिव्यक्ति के अवसर मिलेंगे।
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राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की ओर से दो दिवसीय उत्तराखंड मातृभाषा उत्सव बुधवार से शुरू हो गया। किसान भवन सभागार में आयोजित उत्सव के पहले दिन प्रदेश भर से आए छात्र-छात्राओं ने विभिन्न लोक भाषाओं में नाटक, गायन, लोकगीत आदि के माध्यम से मंच पर उत्तराखंड के लोकजीवन और संस्कृति को साकार कर दिया। कार्यक्रम का उद्घाटन शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने वर्चुअल माध्यम से किया।
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शिक्षा मंत्री ने कहा कि फाउंडेशन लर्निंग के लिए मातृभाषा सबसे उचित माध्यम है। छोटे बच्चे अपनी मातृभाषा में कोई भी चीज सबसे तेजी से सीखते और समझते हैं, जहां तक संभव हो बच्चों को मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए। उन्होंने कहा कि इसकी व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी की गई है। शिक्षा नीति में त्रि-भाषा फॉर्मूले की व्यवस्था है, ताकि बच्चों को हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा स्थानीय भाषा में भी पढ़ाया जा सके।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि राज्य की विभिन्न लोक भाषाओं में बच्चों को लोककथा, नाट्य संवाद एवं लोकगीत के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करने के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, इससे उनके मन में अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान की भावाना विकसित होगी, साथ ही बच्चे एक-दूसरे की भाषाओं से भी परिचित हो पाएंगे। मंत्री ने कहा कि राज्य में लगभग 17 मातृभाषाएं चिन्हित हैं, जिसमें विशेष रूप से गढ़वाली, कुमांऊनी, जौनसारी, रां, रंवाल्टी, जार, माच्र्छा, राजी आदि शामिल है। इसके अलावा प्रदेश में कई बोलियां भी बोली जाती है, जिन्हें संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
कार्यक्रम में बच्चों ने विभिन्न लोकभाषाओं में मनमोहक प्रस्तुतियां दी। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल, शिक्षा सचिव रविनाथ रमन, महानिदेशक विद्यालयी बंशीधर तिवारी, निदेशक शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान सीमा जौनसारी, निदेशक माध्यमिक आरके कुंवर, निदेशक बेसिक वंदना गर्ब्याल, अपर निदेशक डॉ. आरडी शर्मा, आशारानी पैन्यूली, शैलेंद्र अमोली आदि मौजूद रहे।