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अब हिमालय की गोद में बहते झरनों से रोशन होंगे घर

Sun, 20 Sep 2015 01:28 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 20 Sep 2015 01:28 PM IST
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electricity production from waterfall of himalaya.

हिमालयी क्षेत्र में बह रहे झरनों से सिर्फ पानी नहीं मिलेगा, बल्कि घर भी रोशन होंगे। जी, भारत, नार्वे और आइसलैंड के संयुक्त शोध ने इसे साकार कर दिखाया है।

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जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बिखरे तीन सौ से अधिक गर्म झरने सिर्फ गरम पानी ही नहीं देते इनमें ऊर्जा का भंडार भी भरा पड़ा है। इस ऊर्जा से सर्द इलाकों में घरों के भीतर ‘हीटिंग सिस्टम’ के साथ बिजली भी बनेगी।
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इस प्रयोग को पूरी तरह अमल में लाने के बाद ठंडे इलाके में लोगों के घर बिना पावर-कट जगमग रह सकेंगे। वाडिया हिमालयन भू विज्ञान संस्थान तथा नार्वे और आइसलैंड के संयुक्त शोध ने इसे साकार कर दिखाया है।
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गर्म झरनों की ‘जियो थर्मल एनर्जी’ से लद्दाख में हीटिंग सिस्टम और आइसलैंड में बिजली बनाने का प्रयोग सफल रहा है। हिमालय क्षेत्र के भूगर्भ में जहां इंडियन और तिब्बती प्लेटें मिलती हैं, उसके पास 300 से अधिक गर्म झरने (हॉट स्प्रिंग) पैदा हो गए हैं। धरती की ऊर्जा के कारण इनसे गर्म पानी लगातार निकलता है।

दो साल पहले शुरू किया गया था शोध

electricity production from waterfall of himalaya.

वाडिया हिमालयन भू विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. एसके बरतरिया की अगुवाई में डॉ. गौतम रावत, डॉ. एसके राय तथा नार्वे और आइसलैंड के विज्ञानियों ने दो साल पहले इस संबंध में शोध शुरू किया था जो अगस्त 2014 में पूरा हुआ।

विज्ञानियों की टीम ने लद्दाख के चुमाथांग स्थित एक होटल में हीटिंग सिस्टम बनाने में सफलता पाई है। इसी के साथ आइसलैंड में भी जियो थर्मल एनर्जी से बिजली पैदा की जा रही है।

इससे उत्साहित होकर भारत में भी वैज्ञानिक गर्म झरनों की ऊर्जा से बिजली बनाने में जुटे हैं। बिजली बनने की कार्ययोजना पूरी होते ही हिमालयी क्षेत्र के प्रांतों के अलावा आसपास के इलाके भी इसका फायदा ले सकेंगे।

ऐसे बनाया हीटिंग सिस्टम
गर्म झरने के पानी को हीट एक्सचेंजर से गुजारा जाता है। इसमें रेडिएटर का इस्तेमाल होता है। इनमें पानी आते ही हीट कमरे के वातावरण में आ जाती है और कमरा गर्म हो जाता है।

‘हिमालय क्षेत्र के गर्म झरनों से घरों में काम आने वाले हीटिंग सिस्टम चलाने में सफलता मिली है। अब बिजली बनाने की दिशा में कार्य शुरू हो गया है।’
- डॉ. एसके बरतरिया (वरिष्ठ विज्ञानी, वाडिया हिमालयन भू विज्ञान संस्थान)

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