उत्तराखंड में लोकसभा के महामुकाबले का मंच सजा
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निर्वाचन आयोग के ऐलान के बाद 16वीं लोकसभा गठन के लिए आम चुनाव का बिगुल बज गया है। पांच लोकसभा सीट वाला उत्तराखंड संख्यात्मक रूप से बेशक कम लोगों को संसद में भेजता है, लेकिन इसकी खास बात यह है कि कमोबेश यहां का चुनावी संग्राम कांग्रेस और भाजपा दो दलों में सिमटा रहता है।
यहां के वोटर थोक भाव से किसी एक दल के पक्ष में मतदान करते हैं। 2009 के चुनावों में राज्य की सभी पांचों सीटों पर कांग्रेस ने परचम फहराया था। इस बार मोदी की लोकप्रियता रथ पर सवार भाजपा इसी नतीजे की उम्मीद कर रही है।
'आप' पर भी होगी नजर
हरीश रावत की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार भी अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। इस लिहाज से देखें तो वर्ष 2014 के चुनाव काफी संघर्षपूर्ण होंगे। आप जैसी पार्टी का राज्य की सियासत में अभ्युदय क्या गुल खिलाता है यह भी देखने की बात होगी।
फौजी वोट पर सभी दलों की निगाह
लोकसभा चुनाव में सैनिकों, पूर्व सैनिकों सहित अर्द्धसेना बलों के मत किसी भी प्रत्याशी की जीत हार में अहम रहेंगे।
भाजपा को खंडूरी का सहारा
भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के कार्यकाल के साथ अपनी पुरानी सैनिक हितैषी छवि के बूते चुनाव में उतरेगी। राज्य की कुल आबादी का 15 फीसदी सैन्य और अर्धसैनिक बलों से जुड़ी होने के चलते जीत और हार में उनके मतों के साथ पोस्टल बैलेट अहम रहेंगे।
15 प्रतिशत आबादी सैन्य और अर्धसैन्य बलों से जुड़ी
राज्य के डेढ़ लाख पूर्व सैनिक व सैन्य विधवाएं, 80 हजार सेवारत सैनिक और डेढ़ लाख अर्धसैनिक बलों से रिटायर और कार्यरत जवान व अधिकारी हैं।
सरकार ने पूर्व सैनिकों के हितों में बीते चार माह में हाउस टैक्स में माफी, सैनिक स्कूल जखोली, स्टांप ड्यूटी में छूट, वीरता पदकों की राशि बढ़ाने, शहीदों के परिजनों को 10 लाख रुपये का सम्मान सहित कई फैसले दिसंबर 2013 के बाद लिए गए हैं।
लोकसभा क्षेत्रों में पूर्व सैनिक
- अल्मोड़ा लोकसभा क्षेत्र में लगभग 50 हजार पूर्व सैनिक
- पौड़ी लोकसभा क्षेत्र में लगभग 45 हजार पूर्व सैनिक
- टिहरी लोकसभा क्षेत्र में लगभग 35 हजार पूर्व सैनिक
- नैनीताल लोकसभा क्षेत्र में लगभग 18 हजार पूर्व सैनिक
- हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में लगभग 5 हजार पूर्व सैनिक
वन रैंक वन पेंशन का ट्रंप कार्ड
भाजपा सरकार के कार्यकाल में पूर्व सैनिकों के लिए कल्याण योजनाओं की नींव रखी गई, जिसे ठीक चुनाव से पहले कांग्रेस भुनाने में जुट गई है।
पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन देने के फैसले को कांग्रेस अपने नेता राहुल गांधी की देन बताकर पूर्व सैनिकों के बीच प्रचार में जुटी है।
1 अप्रैल से पहले 2006 से पूर्व रिटायर सैनिकों के पेंशन अंतर को समाप्त करने में कामयाब रही तो उसका फायदा उसे मिल सकता है।
एक्स सेंट्रल फोर्सेस पर्सनल
अर्धसैनिक बलों को पूर्व सैनिकों की भांति लाभ देने के लिए राज्य सरकार के एक्स सेंट्रल फोर्सेस पर्सनल के तहत अर्धसैनिक बल कल्याण परिषद का गठन चुनावी माना जा रहा है, लेकिन उससे राज्य के एक लाख अर्धसैनिक बलों से रिटायर लोग लाभान्वित होंगे।
फिर हाशिये पर दिखेंगे क्षेत्रीय दल
उत्तराखंड में अब तक हुए लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दल कोई बड़ी छाप नहीं छोड़ पाए है। सबसे पुराने उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का राज्य गठन से पूर्व जो जनाधार लोकसभा चुनाव में दिखा वह राज्य गठन के बाद हुए चुनावों में लगातार मतदाता प्रतिशत खो रहा है।
वर्ष 2012 विधानसभा चुनावों में उक्रांद के हिस्से एक सीट आई है, जबकि अन्य क्षेत्रीय दल खाता भी नहीं खोल पाए।
वर्ष 2011 में बना उत्तराखंड रक्षा मोर्चा भी आपसी मतभेदों बिखर गया है। हालांकि दल के शीर्ष नेता पूर्व सांसद टीपीएस रावत ने दल को आप में विलय कर अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश जरूर की है।
उक्रांद के दो गुटों में बंटने से क्षेत्रीय दलों की राजनीति सर्वाधिक प्रभावित हुई है। पार्टी का जीता एकमात्र विधायक कांग्रेस की गठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री है, बावजूद पार्टी चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। ऐसी स्थिति में उक्रांद सहित अन्य छोटे क्षेत्र दल जैसे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी आदि का चुनावों में कोई बड़ा असर छोड़ने की उम्मीद कम दिखती है।