हिमालय बेल्ट के फॉल्ट से दिल्ली और उत्तराखंड में भूकंप का खतरा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमालयन बेल्ट में फाल्ट लाइन के कारण लगातार भूकंप के झटके आ रहे हैं। लेकिन इसी फाल्ट पर मौजूद उत्तराखंड में लंबे समय से बड़ी तीव्रता का भूकंप न आने से यहां बड़ा गैप बन हुआ है। जिससे राज्य हिमालयी क्षेत्र में आठ मैग्निट्यूड के भूकंप के बराबर ऊर्जा संचित हो रही है।
जो उत्तराखंड के आसपास हिमालयी क्षेत्र में आठ तीव्रता तक के भूकंप के खतरे की ओर संकेत कर रहा है। आईआईटी में किए गए शोध के मुताबिक यदि उत्तराखंड में 7.5 मैग्निट्यूड का भूकंप आता है तो इससे दिल्ली में भारतीय मानक कोड के अनुसार दिल्ली में बनाए गए आधे से ज्यादा भवनों को क्षति पहुंचने का अनुमान है। हालांकि भूकंप कब और कितनी तीव्रता का आएगा इसे लेकर वैज्ञानिक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
नेपाल में शुक्रवार की रात्रि 10 बजकर 10 मिनट पर 5.2 तीव्रता के भूंकप के झटके आए हैं। जिसका असर नेपाल से सटे बिहार के जिलों में भी महसूस किए गए हैं। इससे पूर्व चार जरवरी को हिमालयन बेल्ट के एक छोर पर मणिपुर में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया था। जिसके चलते अब वैज्ञानिक उत्तराखंड को लेकर आशंकित नजर आ रहे हैं।
काफी समय से बड़े भूकंप न आने से बना है गैप
आईआईटी के अर्थक्वेक डिपार्टमेंट के प्रोफेसर अशोक कुमार के अनुसार भूगर्भ में जितनी एनर्जी स्टोर हो रही है, उस लिहाज से उत्तराखंड में काफी समय से बड़े भूकंप नहीं आए हैं। जिसके कारण यहां एक बड़ा गैप बना हुआ है।
उन्होंने बताया कि हाल में भूकंप के लिहाज से दिल्ली के भवनों पर किए गए शोध से पता चलता है कि यदि उत्तराखंड में 7.5 से अधिक तीव्रता का भूकंप आता है तो इससे दिल्ली में धरती इतनी हिलेगी कि यहां भारत मानक कोड के हिसाब से बनी आधी से ज्यादा इमारतों को क्षति पहुंच सकती है।
उन्होंने बताया कि उत्तराखंड क्षेत्र में अभी तक के भूकंप की बात करें तो 1999 में चमोली में आए भूकंप का मैग्निट्यूड 6.8, 1991 के उत्तरकाशी भूकंप का 6.6, 1980 के धारचूला भूकंप का 6.1 तथा 1975 में किन्नोर के भूकंप का मैग्निट्यूड 6.2 था। जिसके बाद कहा जा सकता है कि हमें भविष्य के खतरे को देखते हुए अभी से कदम उठाने होंगे।
एक मैग्निट्यूट के बढ़ने से निकलती है 30 गुना एनर्जी
वैज्ञानिकों के अनुसार भूकंप के दौरान मैग्निट्यूट की एक यूनिट बढ़ने के साथ ही पृथ्वी से निकलने वाली एनर्जी में 30 गुना वृद्धि होती है।
ऐसे में सात मैग्निट्यूट के 15 भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा भी आठ मैग्निट्यूट के एक भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा की बराबरी नहीं कर पाती। अर्थसाइंस डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक प्रो. एके सराफ के अनुसार उत्तराखंड में लंबे समय से बड़े भूकंप न आने के कारण अब यहां ज्यादा खतरा बन गया है।
उत्तराखंड और दिल्ली को ज्यादा सचेत होने की जरूरत
उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में अधिकांश भवन कंक्रीट के बने हैं। दिक्कत यह है कि ज्यादातर भवनों में भूकंपरोधी मानकों का उपयोग नहीं किया गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार मणिपुर में चार जनवरी को आए 6.8 तीव्रता के भूकंप से ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था। क्योंकि भूकंप के अभिकेंद्र के नजदीक बने ज्यादातर भवन बांस आदि के हल्के मैटीरियल के थे। लेकिन उत्तराखंड और दिल्ली में स्थिति ठीक इसके उलट है। ऐसे में यहां भूकंप के मद्देनजर सचेत होने की जरूरत है।