फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Dynast not works in uttarakhand politics

उत्तराखंड के चुनाव में नहीं चलता परिवारवाद का जादू

Thu, 26 Jan 2017 11:30 AM IST
राकेश खंडूड़ी/ अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 26 Jan 2017 11:30 AM IST
विज्ञापन
Dynast not works in uttarakhand politics
विजय बहुगुणा - फोटो : AmarUjala

प्रदेश के चुनावी समर में परिवारवाद की सियासत को अकसर मुंह की खानी पड़ी है। संसदीय और विधानसभा चुनाव का इतिहास गवाह है कि राजनीतिक विरासत संभालने के लिए जब-जब कदम बढ़े, शुरुआत लड़खड़ाने वाली रही। प्रदेश की राजनीति में कई स्थापित चेहरों को पहले ही चुनाव में मतदाताओं ने खारिज कर दिया। सियासी चुनौतियों की भट्टी में जो तपे वे कुंदन बन गए और जो मुकाबले में नहीं टिक पाए वे नेपथ्य में चले गए।

विज्ञापन


अविभाजित यूपी के समय से लेकर अब तक हुए तमाम चुनावों में परिवारवाद का प्रयोग हुआ। संयोग से ये प्रयोग कांग्रेस की ओर से ज्यादा हुए, मगर पहले पायदान पर यह प्रयोग कोई खास कमाल नहीं दिखा पाए। इसकी सबसे ताजा मिसाल 2014 का लोक सभा चुनाव है, जिसमें हरिद्वार संसदीय सीट से कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हरीश रावत की धर्मपत्नी रेणुका रावत को प्रत्याशी बनाया था। इस सीट पर हरीश रावत सांसद थे।
विज्ञापन


चुनाव में रेणुका को हार का सामना करना पड़ा। टिहरी लोस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को मात मिली। पराजय के बाद साकेत मुख्यधारा की सियासत से गायब हैं। दोनों ही सीटों पर परिवारवाद का जादू नहीं चल सका और मतदाताओं ने दिग्गज नेताओं के रिश्तेदारों को खारिज कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


इससे पूर्व 2009 के लोस चुनाव में भाजपा ने पार्टी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह के करीबी रिश्तेदार निशानेबाज ओलंपियन जसपाल राणा को मैदान में उतारा, मगर टिहरी की जनता ने राणा को खारिज कर दिया। तब से राणा मुख्यधारा की राजनीति से गायब हैं। उन्हें हराने वाले विजय बहुगुणा को भी राजनीति में पांव जमाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी।

पहला चुनाव उन्होंने पौड़ी लोक सभा सीट से यही सोचकर लड़ा था कि गढ़वाल की जनता उन्हें कद्दावर सियासतदां हेमवती नंदन बहुगुणा का उत्तराधिकारी मानकर हाथों-हाथ लेगी। ऐसा हुआ नहीं और बहुगुणा 1998 के इस चुनाव में पराजित हो गए, फिर उन्हें अपना राजनीतिक वजूद तैयार करने के लिए टिहरी संसदीय क्षेत्र का रुख करना पड़ा।

नवप्रभात और प्रीतम सिंह कांग्रेस की राजनीति के स्थापित राजनेताओं में से हैं। दोनों ही नेताओं के पिता का शुमार कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में रहा है, मगर जब राजनीतिक विरासत संभालने की बारी आई तो दोनों ही दिग्गजों के कदम लड़खड़ा गए। चकराता के विधायक रहे गुलाब सिंह के बेटे प्रीतम सिंह को1991 के विधानसभा चुनाव में मुन्ना सिंह चौहान ने शिकस्त दी। यह चुनाव चौहान ने जनता दल के टिकट पर लड़ा था।

वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री ब्रहम दत्त की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए नवप्रभात तैयार हो चुके थे। नवप्रभात तिवारी कांग्रेस से 1996 में मसूरी सीट पर विधानसभा और टिहरी सीट पर लोक सभा का चुनाव लड़े और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। विस में वह भाजपा के राजेन्द्र शाह से हारे। दोनों ही नेताओं को स्थापित होने के लिए खुद को साबित करना पड़ा। कांग्रेस ने वर्ष 2012 में पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के भतीजे मनीष चंद्र तिवारी को गदरपुर सीट से प्रत्याशी बनाया था। चुनाव में मनीष चौथे स्थान पर रहे। कुल मिलाकर बहुगुणा, तिवारी, ब्रहमदत्त, हरीश सरीखे कद्दावर नेताओं की कायल जनता पर उनकी संतानों या रिश्तेदारों का जादू नहीं चल सका। 


भाजपा के सामने परिवारवाद का मिथक तोड़ने की चुनौती
भाजपा ने विधानसभा चुनाव में चार सीटों से राजनेताओं के रिश्तेदारों को उम्मीदवार बनाया है। सियासी हलकों में यह सवाल तैर रहा है कि भाजपा क्या इस मिथक को तोड़ पाएगी कि राज्य की सियासत में परिवारवाद का जादू नहीं चलता है। पार्टी ने यमकेश्वर से  पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की बेटी ऋतु खंडूड़ी को, धनोल्टी से राजनाथ सिंह के समधी नारायण सिंह राणा को, नैनीताल से यशपाल आर्य के बेटे संजीव आर्य और सितारगंज से पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा को प्रत्याशी बनाया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed