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उत्तराखंड कैबिनेट की कुर्सियां तो भरी, मगर अंदरूनी दरार हुई चौड़ी

Fri, 29 Jul 2016 01:27 PM IST
संजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, देहरादून
संजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 29 Jul 2016 01:27 PM IST
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dispute after uttarakhand cabinet expansion
हरीश रावत - फोटो : अमरउजाला

करीब डेढ़ साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद आखिरकार उत्तराखंड कैबिनेट की खाली सीटें भर दी गईं।

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तमाम गुणा-गणित को ध्यान में रखकर दो विधायकों को मंत्रिपद देने के परिणाम तो भविष्य में देखने को मिलेगें, मगर मौजूदा स्थितियों को देखकर साफ कहा जा सकता है कि अब सरकार और संगठन में अंदरखाने पनपी दरार और चौड़ी हो गई है। राजभवन में शपथ गृहण के दौरान जो नजारा था, वह काफी कुछ बयां कर रहा था।

शपथ गृहण समारोह ठीक दस बजे शुरू हुआ। इस दौरान हाल खचाखच भरा था। तमाम लोग कोना पकड़कर भी खड़े थे। यहां मौजूद लोगों में बड़ी संख्या शासन-प्रशासन के अफसरों की थी और शेष दोनों भावी मंत्रियों के समर्थक थे। यह मौका सरकार के लिए बेहद अहम था क्योंकि यह इस सरकार का अंतिम कैबिनेट ‘विस्तार’ माना जा रहा है।
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बावजूद इसके मुख्यमंत्री हरीश रावत के अलावा वित्त मंत्री इंदिरा ह्दयेश, प्रीतम सिंह, मंत्री प्रसाद नैथानी, दिनेश धनै और दिनेश अग्रवाल के अलावा दो-चार विधायक ही यहां मौजूद रहे। गैरमौजूदगी के बारे में पूछने पर सत्ताधारी दल के ज्यादातर विधायकों ने अन्यत्र व्यस्तता के अलावा समय से शपथगृहण की सूचना न मिलने की बात कहकर कन्नी काटी गई।
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शपथ गृहण समारोह के तुरंत बाद पिरान कलियर से कांग्रेसी विधायक फुरकान अहमद ने अल्पसंख्यकों की उपेक्षा करने और वादाखिलाफी का आरोप लगाकर बवाल मचा दिया। कुछ इसी तर्ज पर विधायक राजपुर रोड के विधायक राजकुमार, डोईवाला से विधायक हीरा सिंह बिष्ट ने भी मंत्रिपद न दिए जाने पर अपनी भड़ास निकाल दी।

हरिद्वार की उपेक्षा से हो सकती है मुश्किल

dispute after uttarakhand cabinet expansion
हरीश रावत - फोटो : अमरउजाला

नवप्रभात और राजेंद्र भंडारी को कैबिनेट मंत्री बनाकर मुख्यमंत्री ने क्षत्रिय-ब्राह्मण और गढ़वाल-कुमाऊं फैक्टर को काफी हद तक बैलेंस करने का प्रयास तो किया है, मगर हरिद्वार की उपेक्षा कांग्रेस को भारी पड़ सकती है। मुख्यमंत्री बनने से पूर्व हरीश रावत हरिद्वार से लोकसभा का चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बने थे। यहीं से उनकी पत्नी भी चुनाव लड़ चुकी हैं।

हालांकि वे सीट नहीं निकाल पाई थीं। वर्तमान में यहां कुल 11 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से चार पर कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में विजय पाई थी। प्रदीप बत्रा और प्रणव चैंपियन के पार्टी छोड़ने के बाद अभी भी यहां से ममता राकेश और फुरकान अहमद कांग्रेसी विधायक हैं।

जानकारों का मानना है कि दो प्रमुख नामों के भाजपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस को यहां अपनी स्थिति बेहतर करने का मौका था, मगर स्थितियां पहले से खराब हो सकती हैं। उधर देहरादून जिले में दिनेश अग्रवाल, प्रीतम सिंह के बाद नवप्रभात को शामिल करने से यहां कैबिनेट मंत्रियों की संख्या तीन हो गई है।

अल्पसंख्यकों को तरजीह देने का था वादा
वर्ष 2012 में जब कांग्रेस ने सत्ता संभाली थी तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अल्पसंख्यकों को तरजीह देने की घोषणा की थी। इसके लिए उन्होंने समाज कल्याण विभाग के अल्पसंख्यक कल्याण अनुभाग को विभाग का दर्जा दिया और इससे संबंधित मंत्रालय को अपने पास ही रखा। गौरतलब है कि उत्तराखंड में कुल वोटरों में दस फीसदी अल्पसंख्यक हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कोटे का एक भी मंत्री न होना सरकार को चुनाव में नुकसान पहुंचा सकता है।

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