डब्बू के डाइपर से परेशान है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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डब्बू का डाइपर कहां फेंका जाए? यह सवाल उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उलझन में डाले हुए है।
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बोर्ड तय नहीं कर पा रहा है कि बच्चों के डाइपर को किस श्रेणी में रखा जाए। उसके पास इस संबंध में कोई सटीक गाइडलाइन भी नहीं है। शहर में हर रोज डेढ़ लाख डाइपर का इस्तेमाल होता है।
डाइपर के निर्माण में पॉलीथिन का इस्तेमाल होता है, जो नष्ट नहीं होती है।
प्रयोग की हुई नैपकिन भी परेशानी
लोग प्रयोग किए गए डाइपर को सामान्य कूड़े के साथ फेंक दे रहे हैं। साथ ही महिलाओं की प्रयोग की हुई नैपकिन भी सामान्य कूड़े के ढेर में फेंकी जा रही हैं। दोनों ही प्रदूषण बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
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शहर में प्रतिदिन फेंके जाने वाले डाइपर और नैपकिन की संख्या तकरीबन पांच लाख तक हो जाती है। बोर्ड के अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा है कि वह इन्हें किस श्रेणी में डालें। बायो-मेडिकल वेस्ट में शामिल करें या नहीं?
प्रदूषण संबंधी जो गाइड लाइन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दी है, उसमें डाइपर और नैपकिन का कोई जिक्र ही नहीं है।
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बोर्ड के सदस्य-सचिव विनोद सिंघल ने बताया कि पिछले दिनों डॉक्टरों की बैठक में यह सवाल किया गया था कि डाइपर और नैपकिन को किस केटेगरी में रखा जाए? इस पर उनके पास कोई जवाब नहीं था।
बोर्ड के अधिकारियों ने इस बाबत अपने वरिष्ठों से मशविरा करना शुरू किया है। साथ ही प्रदूषण की गाइडलाइन में डाइपर और नैपकिन की केटेगरी परिभाषित करने की सिफारिश की है।
धुएं की परतें, फुला रहीं सांसें
देहरादून के खुशगवार वातावरण की परतों पर धुएं की काली परतें जम रही हैं। इससे लोगों की सेहत पर खतरा बढ़ रहा है।
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घाटी के माहौल में प्रदूषण की गाढ़ी होती चादर देखकर केंद्र सरकार ने चिंता व्यक्त की है। साथ ही उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आदेश दिया है कि घाटी के ट्रांसपोर्ट प्लान को ध्यान में रखकर नए सिरे से सर्वे कराया जाए।
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केंद्र का पत्र मिलते ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सर्वे के लिए एजेंसी तलाशनी शुरू कर दी है। बोर्ड के सदस्य-सचिव विनोद सिंघल ने बताया कि यह विशेष सर्वे है। इसे घाटी में बढ़े वाहनों की स्थिति के मद्देनजर कराया जाना है।
कई बार आरटीओ को भेजा जा चुका है पत्र
इसके पहले बोर्ड कई मरतबा आरटीओ को पत्र भेज चुका है। लेकिन वाहनों के नियंत्रण के संबंध में कोई कदम नहीं उठाया गया। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हर माह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को रिपोर्ट भेजता है।
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बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शहर में सीएनजी वाहन चलाने की सिफारिश की है। बोर्ड का कहना है कि शहर में चार पहिया, दुपहिया वाहनों की संख्या पांच सालों में कई गुना बढ़ गई है।