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कोविड के कारण टला देव पालकी का प्रस्थान
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चकराता। खत तपलाड़ के लोगों को चालदा महासू देवता की सेवा के लिए एक और वर्ष मिल गया है। देव पालकी अब जून 2022 में कोटा तपलाड़ से बनगांव खत के घण्ता में प्रवेश करेगी। इससे खत तपलाड़ के लोगों में खुशी का माहौल है। वर्तमान में देवता की दो पालकियां जौनसार बावर में चलायमान हैं। एक पालकी कोटा तपलाड़ और दूसरी मोहना गांव में विराजमान है।
कोटा तपलाड़ में विराजमान देव पालकी से 12 खतों की आस्था जुड़ी हुई है। शनिवार को कोटा तपलाड़ स्थित देव थान में आयोजित बैठक में सर्वसम्मति से देव पालकी को अगले वर्ष विदा करने का निर्णय लिया गया। बैठक में खत पंजगांव (थैना) से प्रतिनिधित्व के न आने पर भी नाराजगी जताई गई। निर्णय लिया गया कि यदि खत पंजगांव की ओर थैना में कोई भी बैठक आयोजित होती है तो उसका 11 खतों के लोग पुरजोर विरोध करेंगे। बैठक सिर्फ उसी जगह पर हो सकती है, जहां पर देवता विराजमान हैं। बैठक में ग्राम थैना के देव बजीर स्वराज सिंह, मुंधान के टीकाराम जोशी, चंदेऊ के कुंवर सिंह के निधन पर भी शोक व्यक्त किया गया। निर्णय लिया गया कि चालदा महाराज समिति के रिक्त पदों पर अगली बैठक में चुनाव होंगे। बैठक में राजेंद्र सिंह तोमर, पूरण सिंह खन्ना, विरेंद्र सिंह तोमर, उदय सिंह तोमर, राजेंद्र सिंह चौहान, महावीर सिंह और विजयपाल सिंह मौजूद रहे।
विकासनगर। हनोल स्थित कयलू महाराज मंदिर में चुराच का पहला बकरा कटने के साथ ही जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में मरोज पर्व की शुरुआत हो गई। अब अगले एक माह तक क्षेत्र के हर घर में पर्व की धूम रहेगी। घरों में दावतों का दौर चलेगा।
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लोक मान्यताओं के अनुसार जौनसार-बावर में बहने वाली टोंस नदी का प्राचीन नाम कर्मनाशा था। इस नदी में नरभक्षी कहे जाने वाले किरमीर राक्षस का वास हुआ करता था, जिसे हर रोज एक नरबलि चाहिए होती थी। राक्षस के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए मैंद्रथ गांव निवासी हुणाभाट नामक पंडित ने कुल्लू-कश्मीर जाकर सरोवर ताल के पास भगवान शिव की कठोर तपस्या की। इसके बाद मानव कल्याण की रक्षा को चार भाई महासू के रूप में हनोल में अवतरित हुए। महासू देवता के आदेश पर उनके वीर सेनापति कयलू महाराज ने नरभक्षी किरमीर राक्षस को मौत के घाट उतारा। इससे स्थानीय जनता को किरमीर राक्षस के अत्याचार व आतंक से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। इसके बाद से हर वर्ष माघ पर्व की शुरुआत कयलू देवता के नाम से बकरा काटने के साथ होती है। इस पर्व में हिस्सा लेने के लिए नौकरी के लिए बाहर गए लोग भी घरों को वापस लौटते हैं। चुराच के दो दिन बाद घर-घर में बकरा काटने की शुरुआत होती है, लेकिन इस बार पर्व की तिथि को लेकर लोगों में असमंजस है। ऐसे में कई इलाकों में 11 और कई इलाकों में 12 जनवरी को घर-घर में बकरा काटा जाएगा।
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कोटा तपलाड़ में विराजमान देव पालकी से 12 खतों की आस्था जुड़ी हुई है। शनिवार को कोटा तपलाड़ स्थित देव थान में आयोजित बैठक में सर्वसम्मति से देव पालकी को अगले वर्ष विदा करने का निर्णय लिया गया। बैठक में खत पंजगांव (थैना) से प्रतिनिधित्व के न आने पर भी नाराजगी जताई गई। निर्णय लिया गया कि यदि खत पंजगांव की ओर थैना में कोई भी बैठक आयोजित होती है तो उसका 11 खतों के लोग पुरजोर विरोध करेंगे। बैठक सिर्फ उसी जगह पर हो सकती है, जहां पर देवता विराजमान हैं। बैठक में ग्राम थैना के देव बजीर स्वराज सिंह, मुंधान के टीकाराम जोशी, चंदेऊ के कुंवर सिंह के निधन पर भी शोक व्यक्त किया गया। निर्णय लिया गया कि चालदा महाराज समिति के रिक्त पदों पर अगली बैठक में चुनाव होंगे। बैठक में राजेंद्र सिंह तोमर, पूरण सिंह खन्ना, विरेंद्र सिंह तोमर, उदय सिंह तोमर, राजेंद्र सिंह चौहान, महावीर सिंह और विजयपाल सिंह मौजूद रहे।
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विकासनगर। हनोल स्थित कयलू महाराज मंदिर में चुराच का पहला बकरा कटने के साथ ही जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में मरोज पर्व की शुरुआत हो गई। अब अगले एक माह तक क्षेत्र के हर घर में पर्व की धूम रहेगी। घरों में दावतों का दौर चलेगा।
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लोक मान्यताओं के अनुसार जौनसार-बावर में बहने वाली टोंस नदी का प्राचीन नाम कर्मनाशा था। इस नदी में नरभक्षी कहे जाने वाले किरमीर राक्षस का वास हुआ करता था, जिसे हर रोज एक नरबलि चाहिए होती थी। राक्षस के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए मैंद्रथ गांव निवासी हुणाभाट नामक पंडित ने कुल्लू-कश्मीर जाकर सरोवर ताल के पास भगवान शिव की कठोर तपस्या की। इसके बाद मानव कल्याण की रक्षा को चार भाई महासू के रूप में हनोल में अवतरित हुए। महासू देवता के आदेश पर उनके वीर सेनापति कयलू महाराज ने नरभक्षी किरमीर राक्षस को मौत के घाट उतारा। इससे स्थानीय जनता को किरमीर राक्षस के अत्याचार व आतंक से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। इसके बाद से हर वर्ष माघ पर्व की शुरुआत कयलू देवता के नाम से बकरा काटने के साथ होती है। इस पर्व में हिस्सा लेने के लिए नौकरी के लिए बाहर गए लोग भी घरों को वापस लौटते हैं। चुराच के दो दिन बाद घर-घर में बकरा काटने की शुरुआत होती है, लेकिन इस बार पर्व की तिथि को लेकर लोगों में असमंजस है। ऐसे में कई इलाकों में 11 और कई इलाकों में 12 जनवरी को घर-घर में बकरा काटा जाएगा।